ग्लोबल निवेशक अब अपने US डॉलर एसेट्स को 'अनहेज्ड' छोड़ रहे हैं। अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी के कारण करेंसी इंश्योरेंस की लागत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है, जिससे विदेशी पोर्टफोलियो पर जोखिम बढ़ गया है।
दुनियाभर के इंस्टीट्यूशनल निवेशक तेजी से अपनी डॉलर-हेजिंग रणनीतियों से पीछे हट रहे हैं। बीते एक दशक में प्रोटेक्शन रेश्यो सबसे निचले स्तर पर आ गया है। जैसे-जैसे डॉलर के उतार-चढ़ाव से पोर्टफोलियो को सुरक्षित रखने का खर्च बढ़ रहा है, फंड मैनेजर इंश्योरेंस के भारी प्रीमियम के बजाय सीधे मार्केट रिस्क लेना पसंद कर रहे हैं।\n\nइस ट्रेंड के पीछे मुख्य वजह अमेरिकी Federal Reserve की मौद्रिक नीति है। हेजिंग की लागत सीधे अमेरिका और अन्य देशों की ब्याज दरों के अंतर (Interest Rate Differential) से जुड़ी होती है, जिसके चलते करेंसी स्वैप और फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स बहुत महंगे हो गए हैं। \n\n### भारतीय बाजार और RBI का रुख\nभारतीय संदर्भ में यह स्थिति और जटिल है। Reserve Bank of India (RBI) ने फॉरेक्स मार्केट में सट्टेबाजी को रोकने के लिए विदेशी-मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स पर 20% कैश रिजर्व की शर्त लागू की है। इसने घरेलू इंपोर्टर्स और कॉरपोरेट्स के लिए हेजिंग को और महंगा बना दिया है, जिसके चलते कंपनियां अब बिना सुरक्षा के डॉलर के जोखिम को झेलने के लिए मजबूर हो रही हैं।\n\n### क्या है डबल रिस्क?\nऐतिहासिक रूप से, बाजार गिरने पर डॉलर एक 'सेफ हेवन' की तरह काम करता था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। खासकर टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सेक्टर में बिकवाली के दौरान डॉलर भी कमजोर पड़ रहा है। जो निवेशक AI-लिंक्ड शेयरों में भारी निवेश किए हुए हैं, उन्हें अब डबल रिस्क का सामना करना पड़ रहा है—अगर शेयर गिरते हैं, तो बिना हेजिंग वाला डॉलर पोर्टफोलियो नुकसान को और बढ़ा सकता है।\n\nएक बड़ा बदलाव यह भी है कि पिछले 30 सालों में पहली बार केंद्रीय बैंकों के गोल्ड रिजर्व ने US ट्रेजरी होल्डिंग्स को पीछे छोड़ दिया है। यह स्पष्ट संकेत है कि संस्थाएं अब पारंपरिक डेरिवेटिव्स के बजाय वैकल्पिक साधनों की ओर मुड़ रही हैं। निवेशकों को अब Bloomberg Dollar Spot Index और फेडरल रिजर्व के अगले संकेतों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
