ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों और इजराइल में जारी राजनीतिक गतिरोध ने ग्लोबल मार्केट में अनिश्चितता पैदा कर दी है। साथ ही US और ईरान के बीच बढ़ता तनाव कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित कर सकता है, जिसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार पर पड़ने की आशंका है।
दुनियाभर के वित्तीय बाजारों में इस समय अनिश्चितता का माहौल है। ब्राजील और मिडिल ईस्ट में हो रही राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी घटनाएं निवेशकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई हैं। भारतीय निवेशकों के लिए इसका सीधा कनेक्शन कच्चे तेल की कीमतों और बाजार की स्टेबिलिटी से है, क्योंकि वैश्विक अस्थिरता का असर अक्सर सीधे तौर पर तेल की लागत और रुपये की वैल्यू पर पड़ता है।
ब्राजील की सियासत का असर
ब्राजील के हालिया राष्ट्रपति चुनाव में Luiz Inácio Lula da Silva ने 51.79% वोट हासिल कर जीत दर्ज की है। यह चुनाव परिणाम BRICS अलायंस की भविष्य की दिशा के लिए बहुत अहम है। हालांकि, Flávio Bolsonaro ने नतीजों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है, जिससे देश में निकट भविष्य में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है, जिस पर उभरते बाजारों (Emerging Markets) के निवेशकों की नजरें टिकी हैं।
मिडिल ईस्ट का संकट और तेल की कीमतें
वहीं, इजराइल में राजनीतिक गतिरोध जारी है, जहां Likud-led गठबंधन बहुमत के जादुई आंकड़े 61 के मुकाबले केवल 53 सीटें ही हासिल कर सका है। इस राजनीतिक अनिश्चितता के साथ US और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने भी चिंताएं बढ़ा दी हैं।
भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा क्रूड ऑयल के रूप में आयात करता है। मिडिल ईस्ट में किसी भी प्रकार का विवाद या सप्लाई चेन में रुकावट ग्लोबल लेवल पर तेल की कीमतें बढ़ा सकती है। इसका सीधा असर भारतीय कंपनियों के इनपुट कॉस्ट पर पड़ेगा, विशेषकर मैन्युफैक्चरिंग और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर, जो अंततः महंगाई और रुपये की वैल्यू पर दबाव बना सकता है।
निवेशकों के लिए संकेत
जैसे-जैसे जियोपोलिटिकल रिस्क बढ़ता है, ग्लोबल निवेशक अपना पैसा सुरक्षित एसेट्स की ओर शिफ्ट करने लगते हैं, जिससे भारत जैसे उभरते बाजारों से फंड आउटफ्लो की संभावना बनी रहती है। फिलहाल, भारतीय निवेशकों को क्रूड ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक ट्रेड नीतियों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
