US 10-year Treasury यील्ड बढ़कर **5.34%** के स्तर पर पहुंच गई है, जो **2002** के बाद सबसे अधिक है। इस रिकॉर्ड उछाल ने दुनिया भर के बॉन्ड मार्केट में खलबली मचा दी है, जिससे भारतीय शेयर बाजार पर भी दबाव बढ़ रहा है और विदेशी निवेशक अपना पैसा निकाल रहे हैं।
ग्लोबल इनवेस्टमेंट का मिजाज बदल रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में आई इस जबरदस्त तेजी ने 'TINA' (There Is No Alternative) थ्योरी की कमर तोड़ दी है। सालों से निवेशक केवल बेहतर रिटर्न के लिए इक्विटी की ओर भागते थे, लेकिन अब बॉन्ड मार्केट से मिल रहे रिटर्न ने इसे कड़ी टक्कर देना शुरू कर दिया है।
कॉर्पोरेट कर्ज का बढ़ता संकट
यह संकट सिर्फ सरकारी बॉन्ड्स तक सीमित नहीं है। बड़ी कंपनियां, जिन्होंने AI इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश किया था, अब अपने कैश फ्लो को लेकर सवालों के घेरे में हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण Oracle है, जिसकी क्रेडिट रेटिंग को S&P Global ने जुलाई 2026 में घटाकर BBB- कर दिया है। यह रेटिंग 'जंक' कैटेगरी से महज एक पायदान ऊपर है। कंपनी के लॉन्ग-टर्म बॉन्ड्स की यील्ड अब 8% के करीब पहुंच रही है, जिससे निवेशकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। यदि रेटिंग में और गिरावट आती है, तो बड़े इंस्टीट्यूशनल निवेशकों को मजबूरी में अपने बॉन्ड्स बेचने पड़ सकते हैं।
भारतीय बाजारों पर असर
भारतीय निवेशकों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है। जब अमेरिका जैसे सुरक्षित बाजारों में यील्ड बढ़ती है, तो विदेशी निवेशक भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट से अपना पैसा निकालकर वहां लगाना पसंद करते हैं। यही कारण है कि हाल के दिनों में Nifty 50 और Sensex में बिकवाली का दबाव देखा गया है। इसके अलावा, $100 प्रति बैरल से ऊपर बने कच्चे तेल के दाम और महंगाई ने भारतीय रुपये पर अतिरिक्त दबाव बनाया है, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर सीधा असर पड़ रहा है।
अब आगे क्या?
निवेशकों को अब ग्लोबल सेंट्रल बैंक के फैसलों पर पैनी नजर रखनी होगी। यदि महंगाई कम नहीं हुई, तो ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं, जो शेयर और बॉन्ड दोनों के लिए दबाव का कारण होगा। सस्ती पूंजी का दौर अब बीत चुका है, और मार्केट अब एक नए बदलाव के दौर से गुजर रहा है।
