Global Bond Yields: कर्ज का संकट गहराया, 20 साल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची यील्ड

ECONOMY
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AuthorMehul Desai|Published at:
Global Bond Yields: कर्ज का संकट गहराया, 20 साल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची यील्ड

US 10-year Treasury यील्ड उछलकर **5.34%** पर पहुंच गई है, जो 2002 के बाद का उच्चतम स्तर है। ग्लोबल कर्ज के **$40 ट्रिलियन** के पार जाने और एआई (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भारी कॉरपोरेट कर्ज ने बाजार में वित्तीय दबाव बढ़ा दिया है।

ग्लोबल बॉन्ड मार्केट में उधार लेने की लागत में भारी बढ़ोतरी देखी जा रही है। 1 अक्टूबर, 2026 तक US 10-year Treasury यील्ड 5.34% के स्तर को छू गई है। यह स्थिति 2002 के बाद पहली बार बनी है। यही हाल यूके का भी है, जहां 30-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड 6% के पार निकल गई है, जो 1998 के बाद का सबसे उच्चतम स्तर है। जब सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़ती है, तो आम लोगों से लेकर कंपनियों तक के लिए लोन लेना महंगा हो जाता है क्योंकि ये यील्ड अन्य सभी लोन के लिए बेंचमार्क का काम करती हैं।

कर्ज का बढ़ता बोझ

इन बढ़ती यील्ड्स के पीछे मुख्य वजह सरकारों पर चढ़ा भारी कर्ज है। अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज अब $40 ट्रिलियन के पार निकल चुका है। हालात यह हैं कि सरकारों को बॉन्ड खरीदने के लिए निवेशकों को लुभाने हेतु ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा है। जब सरकारें अपना घाटा पूरा करने के लिए बाजार से ज्यादा पैसा उठाती हैं, तो रिस्क के बदले में निवेशक ऊंची यील्ड की मांग करते हैं। इस कारण सरकार का बजट अब सामाजिक योजनाओं के बजाय पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में ज्यादा खर्च हो रहा है।

एआई (AI) का निवेश और पूंजी के लिए जंग

सरकारी कर्ज के अलावा, टेक कंपनियों की भारी फंडिंग डिमांड ने भी स्थिति को जटिल बना दिया है। Alphabet, Amazon, Meta, Microsoft, और Oracle जैसी दिग्गज कंपनियों ने केवल 2026 में $220 बिलियन से ज्यादा का कर्ज लिया है। यह सारा पैसा महंगे एआई इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर बनाने में खर्च हो रहा है। कॉरपोरेट बॉन्ड्स की भारी सप्लाई और सरकारी बॉन्ड के बीच पूंजी के लिए होड़ ने बाजार में ब्याज दरों को और ऊपर धकेल दिया है।

शेयर बाजार पर असर और भविष्य की राह

इक्विटी निवेशकों के लिए यह स्थिति चिंताजनक है। जब सरकारी बॉन्ड्स पर रिस्क-फ्री रिटर्न बढ़ जाता है, तो निवेशक शेयरों से ज्यादा रिटर्न की उम्मीद करने लगते हैं, जिससे शेयरों के वैल्यूएशन पर दबाव पड़ता है। साथ ही, कंपनियों की बढ़ती फाइनेंसिंग कॉस्ट उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर रही है। आने वाले समय में महंगाई के आंकड़े और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव यह तय करेंगे कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों पर क्या फैसला लेते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.