साल 2025 के अंत में लागू हुए 'Code on Social Security' पर अब विशेषज्ञों ने सवाल खड़े कर दिए हैं। टर्नओवर-आधारित फंडिंग मॉडल के कारण कंपनियों की लागत और मार्जिन पर अनिश्चितता का बादल गहरा गया है, जो निवेशकों के लिए बड़ी चिंता का विषय है।
भारत में नवंबर 2025 से लागू हुए 'Code on Social Security, 2020' का मकसद गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सुरक्षा का दायरा देना था। लेकिन अब इसके फंडिंग मॉडल की निष्पक्षता और टिकाऊपन पर बहस तेज हो गई है। मौजूदा नियमों के तहत, एग्रीगेटर कंपनियों को अपने सालाना टर्नओवर का 1–2% हिस्सा सोशल सिक्योरिटी फंड में देना होता है, जो गिग वर्कर्स को दिए गए कुल भुगतान का अधिकतम 5% हो सकता है। जानकारों का कहना है कि यह मॉडल अकाउंटिंग डेटा पर ज्यादा निर्भर है, न कि वर्कर्स की वास्तविक संख्या पर।
मार्जिन और कंप्लायंस पर दबाव
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती 'कंप्लायंस कॉस्ट' की अनिश्चितता है। चूंकि योगदान रेवेन्यू से जुड़ा है, इसलिए कंपनी अगर अपना बिजनेस मॉडल (जैसे मार्केटप्लेस से इन्वेंटरी-लेड) बदलती है, तो उसके भुगतान की देनदारी भी बदल जाती है। इससे दो समान आकार वाली कंपनियों पर अलग-अलग वित्तीय बोझ पड़ सकता है। नीति आयोग का अनुमान है कि साल 2029–30 तक देश में गिग वर्कर्स की संख्या 2.35 करोड़ तक पहुंच जाएगी, जिससे इन खर्चों का मैनेजमेंट कंपनियों के बजट का एक अहम हिस्सा बन गया है।
कानूनी पेंच और भविष्य की राह
स्थितियां तब और चुनौतीपूर्ण हो गईं जब केंद्रीय कानून और राज्य सरकारों के एक्ट्स के बीच टकराव शुरू हुआ। कर्नाटक के 'Platform-Based Gig Workers Act, 2025' को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई ने यह साबित कर दिया है कि प्लेटफॉर्म्स के लिए लंबी अवधि की प्लानिंग करना कितना मुश्किल है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि अब सरकार को EPF और ESI की तरह 'पेआउट-लिंक्ड मॉडल' अपनाना चाहिए। अगर योगदान वर्कर्स की कमाई से जुड़ जाता है, तो यह सिस्टम अधिक पारदर्शी और स्थायी हो जाएगा। फिलहाल, निवेशकों की नजरें केंद्र और राज्यों के कानूनी विवादों के निपटारे और 2020 के कोड में संभावित बदलावों पर टिकी हैं।
