Gig Platforms: वर्कर्स की इंश्योरेंस पॉलिसी पर बढ़ रहा सरकारी दबाव, मुनाफे पर हो सकता है असर

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
Gig Platforms: वर्कर्स की इंश्योरेंस पॉलिसी पर बढ़ रहा सरकारी दबाव, मुनाफे पर हो सकता है असर

सरकार के साल 2020 के निर्देशों के बावजूद कई भारतीय गिग प्लेटफॉर्म्स केवल सीमित एक्सीडेंट कवर दे रहे हैं। यह बढ़ता रेगुलेटरी रिस्क आने वाले समय में कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन और कंप्लायंस कॉस्ट को प्रभावित कर सकता है।

भारत की गिग इकोनॉमी में करीब 1.2 करोड़ वर्कर्स जुड़े हैं, लेकिन इनके लिए व्यापक लाइफ इंश्योरेंस की कमी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरी है। फिलहाल ज्यादातर प्लेटफॉर्म्स केवल सड़क दुर्घटनाओं से जुड़ी मौत या विकलांगता पर कवर देते हैं, जबकि प्राकृतिक मृत्यु जैसे जोखिमों के लिए कोई सुरक्षा कवच नहीं है।

सरकारी नियमों और हकीकत का अंतर

सड़क परिवहन मंत्रालय (MoRTH) ने 2020 में ही गाइडलाइंस जारी की थीं, जिसके तहत एग्रीगेटर्स के लिए ड्राइवर्स को ₹10 लाख का टर्म लाइफ इंश्योरेंस देना अनिवार्य था। इसी तरह 'कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020' भी पेश किया गया था, लेकिन इसके नियम अभी भी लागू होने के इंतजार में हैं।

निवेशकों के लिए क्या हैं खतरे?

निवेशकों की चिंता अब इन कंपनियों के बढ़ते ऑपरेटिंग खर्चों को लेकर है। यदि सरकार अनिवार्य कवरेज या 'प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना' जैसे सरकारी स्कीमों के एकीकरण का दबाव डालती है, तो कंपनियों का खर्च बढ़ना तय है। इसके अलावा, आजकल के संस्थागत निवेशक ESG (एनवायर्नमेंटल, सोशल और गवर्नेंस) स्टैंडर्ड्स पर बहुत बारीकी से नजर रखते हैं। अगर प्लेटफॉर्म्स सामाजिक सुरक्षा देने में फेल होते हैं, तो उनकी ESG रेटिंग और लॉन्ग-टर्म ब्रांड वैल्यू पर बुरा असर पड़ सकता है।

IRDAI का रुख होगा अहम

भारतीय बीमा नियामक (IRDAI) पर भी दबाव है कि वह मास्टर पॉलिसीहोल्डर्स की जिम्मेदारियों को लेकर स्पष्ट सर्कुलर जारी करे। अगर ये नियम सख्त होते हैं, तो गिग प्लेटफॉर्म्स को अपने पूरे इंश्योरेंस ढांचे को बदलना पड़ सकता है। आने वाले समय में रेगुलेटरी अपडेट्स और कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी के बीच का संतुलन ही उनके भविष्य की सेहत तय करेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.