जर्मनी की एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी पॉलिसी में बड़े बदलाव की तैयारी है। नए ड्राफ्ट के मुताबिक करीब **40%** सरकारी प्रोजेक्ट्स से क्लाइमेट असेसमेंट की अनिवार्यता हट सकती है, जिससे फॉसिल फ्यूल फाइनेंसिंग का रास्ता फिर से खुल सकता है।
जर्मनी सरकार अपनी एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी गाइडलाइंस में बड़े बदलाव करने जा रही है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कंपनियों को मिलने वाले सरकारी बीमा और लोन सपोर्ट का आधार हैं। इस नए ड्राफ्ट पर 9 अक्टूबर, 2026 तक पब्लिक कमेंट्स मांगे गए हैं, लेकिन इसे लेकर बहस तेज हो गई है।
क्यों है विवाद?
विशेषज्ञों का कहना है कि नए नियमों से करीब 40% प्रोजेक्ट्स को सख्त क्लाइमेट स्क्रीनिंग से छूट मिल सकती है। यह गारंटी लेंडर्स के लिए जोखिम कम करती है, जिससे भारी-भरकम प्रोजेक्ट्स को आसानी से फंड मिल जाता है। विवाद का मुख्य बिंदु 'एनर्जी ट्रांजिशन' की परिभाषा है।
फॉसिल फ्यूल को लेकर चिंता
नए ड्राफ्ट में गैस-आधारित पावर प्लांट्स के लिए गुंजाइश रखी गई है, बशर्ते वे 'हाइड्रोजन-रेडी' हों या उनमें फ्यूचर में कार्बन कैप्चर तकनीक लगाने की सुविधा हो। पर्यावरण संगठनों का तर्क है कि यह कदम जर्मनी की 2021 की उस अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता के खिलाफ है, जिसमें देश ने फॉसिल फ्यूल प्रोजेक्ट्स की सरकारी फंडिंग रोकने का वादा किया था।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या हैं मायने?
यह स्थिति ग्लोबल एनर्जी ट्रांजिशन की जटिलताओं को दर्शाती है। भारत की वे कंपनियां जो ग्रीन हाइड्रोजन और एनर्जी स्टोरेज के क्षेत्र में जर्मन फर्मों के साथ काम कर रही हैं, उन्हें इस बदलते रेगुलेटरी लैंडस्केप पर नजर रखनी चाहिए। नीतिगत स्पष्टता की कमी न केवल रिप्यूटेशनल रिस्क बढ़ा सकती है, बल्कि प्रोजेक्ट्स की एलिजिबिलिटी को भी प्रभावित कर सकती है।
इन्वेस्टर्स को अब अंतिम गाइडलाइंस का इंतजार करना चाहिए, क्योंकि इसमें दी गई तकनीकी परिभाषाएं ही तय करेंगी कि कौन सा प्रोजेक्ट ग्रीन है और कौन सा नहीं।
