Siemens और Volkswagen जैसी बड़ी जर्मन कंपनियां अब भारत को केवल एक बाजार नहीं, बल्कि अपना ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और R&D हब बनाने की तैयारी में हैं। भारत में मौजूद **2,000** से ज्यादा जर्मन कंपनियां अगले कुछ सालों में अपनी क्षमता को **2 से 3 गुना** बढ़ाने पर विचार कर रही हैं।
भारत पर क्यों दांव लगा रही हैं जर्मन कंपनियां?
जर्मन औद्योगिक दिग्गज अब भारत को लेकर अपनी रणनीति बदल रहे हैं। Volkswagen, Skoda और Siemens जैसी कंपनियां अपनी 'चाइना-प्लस-वन' (China-plus-one) स्ट्रैटेजी के तहत भारत को मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन का मुख्य केंद्र बनाना चाहती हैं। इनका मकसद केवल बिक्री बढ़ाना नहीं, बल्कि ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की भूमिका को मजबूत करना है, ताकि ऑपरेशनल लागत को कम किया जा सके।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
भारत में पहले से ही 2,100 से अधिक जर्मन कंपनियां काम कर रही हैं। अगले 2 से 5 साल के भीतर अपनी क्षमता को कई गुना बढ़ाने की योजना का मतलब है कि घरेलू ऑटोमोटिव कंपोनेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) देखने को मिलेगा। इससे स्थानीय इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन कंपनियों को बड़े ऑर्डर मिल सकते हैं।
व्यापार समझौता और कार्बन टैक्स का पेंच
यह पूरी रणनीति 2026 तक होने वाले India-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर काफी हद तक टिकी है। अगर यह समझौता होता है, तो टेक्नोलॉजी और कैपिटल का फ्लो काफी आसान हो जाएगा। हालांकि, यूरोपीय यूनियन का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) एक बड़ी चुनौती है। यह यूरोप में आने वाले कार्बन-इंटेंसिव सामान पर एक तरह का टैक्स है, जो भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए लागत बढ़ा सकता है और मुनाफे पर असर डाल सकता है।
निवेशकों को अब उन प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन और सरकारी समझौतों की प्रोग्रेस पर पैनी नजर रखनी होगी, क्योंकि यही तय करेगा कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ आगे कितनी तेज होगी।
