चीन अब पाकिस्तान को छोड़कर बांग्लादेश के लॉजिस्टिक्स हब पर फोकस बढ़ा रहा है। इस बदलते भू-राजनीतिक माहौल के बीच भारत के Eastern Dedicated Freight Corridor और INSTC जैसे प्रोजेक्ट्स की अहमियत और बढ़ गई है।
यूरेशियन लॉजिस्टिक्स में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। चीन अपनी स्ट्रैटेजी में बदलाव करते हुए बांग्लादेश के मोंगला (Mongla) और मीरसराय (Mirsarai) जैसे आर्थिक हब को प्राथमिकता दे रहा है। दूसरी ओर, चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) सुरक्षा संबंधी चिंताओं और कम ट्रैफिक के कारण अपनी कॉमर्शियल स्थिरता को लेकर संघर्ष कर रहा है।
भारतीय बाजारों के लिए क्या हैं संकेत?
ये घटनाक्रम केवल कूटनीतिक नहीं हैं, बल्कि ये सीधे तौर पर रीजनल ट्रेड और लॉजिस्टिक्स कॉस्ट से जुड़े हैं। जैसे-जैसे ग्लोबल सप्लाई चेन डायवर्सिफाई हो रही है, दक्षिण एशिया में इंफ्रास्ट्रक्चर की कनेक्टिविटी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कॉम्पिटिटिवनेस के लिए अहम हो गई है। बांग्लादेश में चीन समर्थित प्रोजेक्ट्स की बढ़ती मौजूदगी भारत के 2,843 किलोमीटर लंबे Dedicated Freight Corridor (DFC) के सामने नई चुनौतियां पेश कर सकती है।
भारत का काउंटर-प्लान: मल्टी-मोडल नेटवर्क
जवाब में, भारत ने अपने मल्टी-मोडल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क में तेजी ला दी है। इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के जरिए रूस, ईरान और मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापारिक वॉल्यूम बढ़ रहा है। घरेलू स्तर पर, DFC पूरी तरह ऑपरेशनल होने से बल्क फ्रेट क्षमता बढ़ेगी, जिससे पूरे भारतीय इकोनॉमी में लॉजिस्टिक्स कॉस्ट को कम करने में मदद मिलेगी।
निवेशकों के लिए टेकअवे
निवेशकों को केवल प्रोजेक्ट घोषणाओं पर ध्यान देने के बजाय, कॉरिडोर से होने वाले वास्तविक माल परिवहन (Goods Transport) पर नजर रखनी चाहिए। लॉजिस्टिक्स और पोर्ट से जुड़े सेक्टर इन बदलावों के प्रति सबसे संवेदनशील होते हैं। जब क्षेत्रीय गलियारे अधिक कुशल बनते हैं, तो यह व्यापार की लागत को कम करता है, जिससे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड इंडस्ट्रीज और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन में सुधार हो सकता है। हालांकि, बंगाल की खाड़ी में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भविष्य में अनिश्चितताएं पैदा कर सकती है।
