GST Input Tax Credit (ITC) के सख्त नियमों के चलते कंपनियों का कैश फ्लो दबाव में है। 7 अक्टूबर 2026 को होने वाली GST काउंसिल की बैठक पर सभी की नजरें हैं, जहां नियमों में बदलाव और राहत की उम्मीद की जा रही है।
भारत में कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए Input Tax Credit (ITC) को मैनेज करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। हालांकि ITC कंपनियों को इनपुट पर दिए गए टैक्स को आउटपुट टैक्स के साथ एडजस्ट करने की सुविधा देता है, लेकिन इसकी जटिलताएं सीधे तौर पर कंपनियों के कैश फ्लो और मुनाफे को प्रभावित करती हैं। 7 अक्टूबर 2026 को होने वाली GST काउंसिल की बैठक में 'GST 2.0' रिफॉर्म्स पर चर्चा संभावित है, जो खासकर उन खरीदारों के लिए सुरक्षा कवच प्रदान कर सकती है जिनके सप्लायर इनवॉइस रिपोर्ट करने में चूक कर देते हैं।
अनुपालन (Compliance) और सप्लायर पर निर्भरता
CGST एक्ट की धारा 16(2) के तहत ITC क्लेम करना ऑटोमैटिक नहीं है। इसके लिए वैध इनवॉइस, सामान की प्राप्ति और सप्लायर द्वारा सरकारी खजाने में टैक्स जमा करना जरूरी है। अगर सप्लायर GSTR-1 फाइल करने में देरी करता है, तो खरीदार का क्रेडिट रुक जाता है। यही कारण है कि अब वेंडर की विश्वसनीयता की जांच करना वित्तीय कंट्रोल का अहम हिस्सा बन गया है।
180 दिन का नियम और कैश फ्लो
लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए 180 दिन का नियम सबसे चुनौतीपूर्ण है। यदि कोई कंपनी इनवॉइस मिलने के 180 दिन के भीतर भुगतान नहीं करती, तो उसे लिए गए ITC को ब्याज के साथ रिवर्स करना पड़ता है। यह एक टैक्स लाभ को अचानक शॉर्ट-टर्म लायबिलिटी में बदल देता है, जो लंबी वर्किंग कैपिटल साइकिल वाली कंपनियों के लिए भारी पड़ता है।
ब्लॉक क्रेडिट का जाल
धारा 17(5) के तहत कई खर्चों पर ITC नहीं मिलता। इसमें फूड, बेवरेज, कैटरिंग और हेल्थ सर्विसेज शामिल हैं। साथ ही, कंस्ट्रक्शन से जुड़े खर्चों जैसे सीमेंट और स्टील पर भी क्रेडिट मिलना मुश्किल होता है, भले ही ये प्लांट के निर्माण में इस्तेमाल हुए हों। इसके अलावा मोटर व्हीकल से जुड़े नियम भी कमर्शियल लॉजिस्टिक्स के रिकॉर्ड को जटिल बनाते हैं।
भविष्य में क्या बदलाव?
7 अक्टूबर 2026 की बैठक में एनफोर्समेंट के नियमों को आसान बनाने पर जोर दिया जा सकता है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा इवेंट है, क्योंकि नियमों में ढील से कंपनियों की वर्किंग कैपिटल एफिशिएंसी सुधरेगी और मार्जिन स्टैबिलिटी को मजबूती मिलेगी।
