SEBI के पूर्व मेंबर अनंत नारायण गोपालकृष्णन ने भारतीय डेरिवेटिव्स मार्केट में बड़े रिफॉर्म्स की मांग की है। उन्होंने रिटेल ट्रेडर्स को हो रहे भारी नुकसान और मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर के बीच के टकराव पर चिंता जताई है।
रिटेल ट्रेडर्स के लिए खतरे की घंटी
अनंत नारायण गोपालकृष्णन, जो अक्टूबर 2025 तक SEBI के मेंबर रहे हैं, ने इक्विटी डेरिवेटिव्स मार्केट में बढ़ते स्ट्रक्चरल रिस्क की ओर इशारा किया है। उनके डेटा के अनुसार, F&O सेगमेंट में ट्रेड करने वाले लगभग 90% व्यक्तिगत प्रतिभागियों को सालाना आधार पर नुकसान उठाना पड़ता है। यह ट्रेंड खास तौर पर 'वीकली इंडेक्स ऑप्शंस' जैसे शॉर्ट-डेटेड कॉन्ट्रैक्ट्स में ज्यादा देखने को मिल रहा है, जो हेजिंग के बजाय सट्टेबाजी का साधन बन गए हैं। एक्सपायरी के दिन इस सट्टेबाजी के कारण मार्केट में भारी वोलैटिलिटी (Volatility) देखी जा रही है।
मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर में टकराव
एक्सचेंजों और क्लियरिंग हाउस के काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाए गए हैं। चूँकि ये संस्थाएं प्रॉफिट-ड्रिवन (Profit-driven) होती हैं, ऐसे में इनके कमर्शियल हितों और निवेशक सुरक्षा के बीच टकराव की स्थिति बनी रहती है। गोपालकृष्णन का सुझाव है कि मार्केट की स्थिरता बनाए रखने के लिए रेगुलेटरी और रिस्क मैनेजमेंट से जुड़े महत्वपूर्ण काम एक 'न्यूट्रल' और 'नॉट-फॉर-प्रॉफिट' एंटिटी को सौंपे जाने चाहिए ताकि सिस्टम की सुरक्षा को कमर्शियल दबाव से अलग रखा जा सके।
मौद्रिक नीति और करेंसी पर नजर
करेंसी मार्केट को लेकर उन्होंने RBI के FCNR(B) स्वैप फैसिलिटी की बारीकियों पर भी चर्चा की है। हालांकि ये कदम रुपये में शॉर्ट-टर्म उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए लिए जाते हैं, लेकिन इनके चलते RBI पर डॉलर रिटर्न का रिस्क बढ़ जाता है, जो इंटरेस्ट रेट सिग्नल्स को प्रभावित कर सकता है। निवेशकों के लिए अब रेगुलेटर द्वारा F&O फ्रेमवर्क को सख्त करने के कदमों और एक्सचेंजों के रेवेन्यू मॉडल में आने वाले बदलावों पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा।
