SBI Funds: भारतीय बॉन्ड में विदेशी निवेश पर लगा ब्रेक, क्यों रहेंगे निवेशक दूर?

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorAditya Rao|Published at:
SBI Funds: भारतीय बॉन्ड में विदेशी निवेश पर लगा ब्रेक, क्यों रहेंगे निवेशक दूर?

SBI Funds Management का अनुमान है कि भारतीय सरकारी बॉन्ड में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी कम बनी रहेगी। टैक्स में हालिया बदलावों के बावजूद, ऊंची ग्लोबल ब्याज दरें और ब्लूमबर्ग ग्लोबल इंडेक्स में भारत के शामिल होने में देरी, निवेशकों के लिए बड़ी बाधाएं हैं।

विदेशी निवेश पर SBI Funds की राय

SBI Funds Management की लेटेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले महीनों में भारतीय सरकारी बॉन्ड में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (Foreign Portfolio Investment) धीमा रहने की उम्मीद है। सरकार ने सॉवरेन बॉन्ड (Sovereign Bond) की खरीद पर विदहोल्डिंग टैक्स (Withholding Tax) और लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (Long-term Capital Gains Tax) को खत्म करके विदेशी पूंजी को आकर्षित करने की कोशिश की थी, लेकिन विदेशी मांग में वैसी तेजी देखने को नहीं मिली जैसा अनुमान था।

इंडेक्स में शामिल होने में देरी बनी बड़ी रुकावट

विदेशी निवेश में कमी का एक मुख्य कारण ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स (Bloomberg Global Aggregate Index) में भारत के शामिल होने में हुई देरी है। इस कदम से भारतीय सॉवरेन डेट (Sovereign Debt) में बड़ी पैसिव इन्वेस्टमेंट (Passive Investment) आने की उम्मीद थी। हालांकि, मार्केट रिफॉर्म्स (Market Reforms) के ऑपरेशनल टेस्टिंग के लिए इस प्रक्रिया को टाल दिया गया है, जिससे विदेशी पूंजी के लिए एक प्रमुख नियर-टर्म ट्रिगर (Near-term Trigger) खत्म हो गया है।

ऊंची ग्लोबल ब्याज दरें और करेंसी की चिंता

SBI Funds का यह भी मानना है कि व्यापक मैक्रोइकोनॉमिक माहौल (Macroeconomic Environment) भी एक बाधा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा 5.25% पर रेपो रेट (Repo Rate) बनाए रखने का फैसला महंगाई को नियंत्रित करने पर केंद्रित है, जो वर्तमान में 5% के आसपास है। जहां यह नीतिगत स्थिरता प्रदान करता है, वहीं उभरते बाजारों (Emerging Markets) के लिए वैश्विक ब्याज दर का माहौल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं (Developed Economies) में ऊंची यील्ड्स (Yields), चिपकी हुई महंगाई (Sticky Inflation) के कारण, कई ग्लोबल फंड्स के लिए भारतीय बॉन्ड को तुलनात्मक रूप से कम आकर्षक बनाती हैं।

शॉर्ट-टर्म पोजीशन पर फोकस

करेंसी की अस्थिरता (Currency Volatility) भी एक लगातार चिंता का विषय है। अंतरराष्ट्रीय निवेशक फिलहाल भारतीय डेट (Indian Debt) में लॉन्ग-टर्म होल्डिंग्स (Long-term Holdings) के बजाय शॉर्ट-टर्म पोजीशन (Short-term Positions) तक अपनी एक्सपोजर को सीमित कर रहे हैं। भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं (Geopolitical Uncertainties) और वैश्विक बाजारों में लगातार महंगाई का दबाव इस सावधानी को और बढ़ाता है, जिससे ग्लोबल बॉन्ड यील्ड्स ऊंची बनी हुई हैं।

आगे क्या?

बाजार सहभागियों (Market Participants) के लिए, यह ट्रेंड बताता है कि विदेशी इनफ्लो (Foreign Inflows) से अपेक्षित लिक्विडिटी बूस्ट (Liquidity Boost) को आने में और समय लग सकता है। घरेलू बॉन्ड मार्केट (Domestic Bond Market) स्थानीय कारकों पर निर्भरता के दौर से गुजर रहा है, जबकि वैश्विक कैटेलिस्ट (Global Catalysts) फिलहाल होल्ड पर हैं। निवेशकों के लिए आगे मुख्य रूप से ग्लोबल इंडेक्स में शामिल होने की अपडेटेड टाइमलाइन (Updated Timeline) और RBI की ब्याज दर गाइडेंस (Interest Rate Guidance) में किसी भी बदलाव पर नजर रहेगी, क्योंकि यही तय करेगा कि फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के बाद के हिस्से में विदेशी भागीदारी बढ़ेगी या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.