India में विदेशी कंपनियों का जलवा! 5 साल बाद पहली बार खुलीं ज्यादा, बंद हुईं कम

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AuthorAditya Rao|Published at:
India में विदेशी कंपनियों का जलवा! 5 साल बाद पहली बार खुलीं ज्यादा, बंद हुईं कम

भारत में विदेशी कंपनियों के लिए अच्छी खबर है। वित्तीय वर्ष (Financial Year) 2025-26 में पहली बार ऐसा हुआ है जब भारत में नई विदेशी कंपनियों के आने का आंकड़ा, बंद होने वाली कंपनियों से ज्यादा रहा। इस दौरान **102** नई विदेशी कंपनियां शुरू हुईं, जबकि **84** बंद हुईं। इससे पता चलता है कि विदेशी कंपनियों का भारतीय बाजार में अब ज्यादा इंटरेस्ट बढ़ रहा है।

भारत में विदेशी कंपनियों के लिए बदला माहौल

भारत में विदेशी कंपनियों की एक्टिविटी में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। नए वित्तीय वर्ष (Financial Year) 2025-26 के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश में नई विदेशी कंपनियों के आने का सिलसिला उन कंपनियों से आगे निकल गया है जिन्होंने यहां अपना कामकाज बंद किया है। इस अवधि में 102 विदेशी कंपनियों ने अपना औपचारिक बिजनेस रजिस्ट्रेशन कराया, जबकि 84 कंपनियों ने अपना काम बंद कर दिया। पिछले 5 सालों में यह पहली बार है जब यह आंकड़ा पॉजिटिव रहा है, जो भारतीय इकोनॉमी में विदेशी बिजनेस के लिए फिर से बढ़ते इंटरेस्ट को दिखाता है।

सब्सिडियरी कंपनियों में भी उछाल

यह ट्रेंड विदेशी पेरेंट कंपनियों द्वारा नियंत्रित भारतीय सब्सिडियरी (Subsidiary) कंपनियों के मामले में और भी ज्यादा मजबूत हुआ है। इसी फाइनेंशियल ईयर में, 2,191 नई सब्सिडियरी कंपनियां शुरू की गईं, जबकि 294 बंद हुईं। यह सब्सिडियरी ग्रोथ में लगातार बढ़ोतरी को दर्शाता है, जो 2021-22 के फाइनेंशियल ईयर में दर्ज 1,829 नई सब्सिडियरी से लगातार बढ़ी है।

मौजूदा कॉर्पोरेट परिदृश्य

30 जुलाई, 2026 तक के कॉरपोरेट रजिस्ट्रार के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल 3,313 एक्टिव विदेशी कंपनियां हैं और 19,881 भारतीय कंपनियां हैं जिनके पीछे विदेशी होल्डिंग एंटिटीज का समर्थन है। ये आंकड़े बताते हैं कि ग्लोबल इकोनॉमिक उतार-चढ़ाव के बावजूद, कई इंटरनेशनल कॉर्पोरेशन्स भारत को लॉन्ग-टर्म ऑपरेशंस के लिए एक स्ट्रेटेजिक डेस्टिनेशन मान रहे हैं।

बिजनेस बंद होने के कारण

हालांकि नए रजिस्ट्रेशन का बढ़ना मार्केट कॉन्फिडेंस के लिए एक पॉजिटिव संकेत है, लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि कंपनियां बंद क्यों हो रही हैं। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs) द्वारा लोकसभा में दिए गए बयानों के अनुसार, बिजनेस बंद करने का फैसला आमतौर पर इंटरनल कमर्शियल फैक्टर्स पर आधारित होता है। इनमें ग्लोबल कॉर्पोरेट प्रायोरिटीज में बदलाव, सेक्टर-स्पेसिफिक स्ट्रैटेजी में परिवर्तन और एफिशिएंट कैपिटल एलोकेशन की लगातार जरूरत शामिल है। जब कोई विदेशी एंटिटी यह तय करती है कि उसका भारतीय यूनिट अब उसके व्यापक फाइनेंशियल लक्ष्यों के साथ अलाइन नहीं कर रहा है या लोकल बिजनेस मॉडल को महत्वपूर्ण ऑपरेशनल वायबिलिटी इश्यूज का सामना करना पड़ रहा है, तो वह जारी रखने के बजाय बंद करने का विकल्प चुन सकती है।

सरकार वर्तमान में इन विदेशी एंटिटीज के एम्प्लॉयमेंट पर पड़ने वाले स्पेसिफिक इफेक्ट को ट्रैक नहीं करती है। इसका मतलब है कि जहां डेटा कॉर्पोरेट प्रेजेंस में नेट बढ़ोतरी दिखा रहा है, वहीं डोमेस्टिक लेबर मार्केट पर इसका सीधा असर सटीक रूप से मापना मुश्किल बना हुआ है। इस ट्रेंड पर नजर रखने वाले इन्वेस्टर्स को फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) इनफ्लो और स्पेसिफिक सेक्टर-लेवल ग्रोथ से संबंधित घोषणाओं पर ध्यान देना जारी रखना चाहिए, क्योंकि ये स्पष्ट संकेत देंगे कि क्या रजिस्ट्रेशन की यह मोमेंटम भारत में महत्वपूर्ण लॉन्ग-टर्म कैपिटल स्पेंडिंग और जॉब क्रिएशन में बदल रही है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.