Union Finance Ministry ने राज्यों के लिए एक नया रोडमैप तैयार किया है, जिसके तहत 2032 तक कैपिटल स्पेंडिंग (Capex) को GSDP के **3%** तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। इस कदम का मकसद सरकारी फंड पर निर्भरता कम कर प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी को बढ़ावा देना है।
राज्यों के खर्च में होगी बढ़ोतरी
फिलहाल राज्यों का कैपिटल एक्सपेंडिचर उनके Gross State Domestic Product (GSDP) का लगभग 2.4% है। मंत्रालय का स्पष्ट मानना है कि देश की इकोनॉमिक रफ्तार बनाए रखने के लिए इसे वित्तीय वर्ष 2031-32 तक 3% के स्तर पर लाना अनिवार्य है। सरकार ने साफ किया है कि इस पूरी प्रक्रिया में 'फिस्कल प्रूडेंस' (वित्तीय अनुशासन) को प्राथमिकता दी जाएगी, जिसे Japan Credit Rating Agency जैसे बड़े संस्थानों ने भी सराहा है।
प्राइवेट सेक्टर पर दांव और बैंकिंग का साथ
DEA सेक्रेटरी अनुराधा ठाकुर ने जोर देते हुए कहा कि सिर्फ सरकारी बजट के दम पर देश के बड़े लक्ष्यों को हासिल करना मुमकिन नहीं है। अब मॉडल को सरकारी खर्च से बदलकर 'प्राइवेट सेक्टर पार्टनरशिप' की ओर ले जाया जा रहा है। इसके लिए राज्यों को 'सिंगल-विंडो' क्लीयरेंस सिस्टम लागू करने की सलाह दी गई है ताकि प्राइवेट कंपनियां बिना किसी रुकावट के काम शुरू कर सकें।
बैंकिंग सेक्टर की भूमिका
इस समिट में State Bank of India के चेयरमैन चल्ला श्रीनिवासुलु शेट्टी भी शामिल हुए, जहां लार्ज-स्केल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बैंकिंग लिक्विडिटी पर चर्चा हुई। हालांकि, बिहार और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने इस दिशा में सहमति तो जताई है, लेकिन मॉडर्न टेक्नोलॉजी और नए एनर्जी सोर्सेज की तरफ ट्रांजिशन को लेकर कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी सामने आई हैं। अब निवेशकों की नजरें इस बात पर हैं कि राज्य इन प्रोजेक्ट्स को कितनी तेजी से जमीन पर उतार पाते हैं, क्योंकि इसका सीधा असर देश की कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के कामकाज पर पड़ेगा।
