US Federal Reserve ने ब्याज दरों को **3.75%** से **4.00%** के बीच स्थिर रखा है। महंगाई के **2%** के लक्ष्य से ऊपर रहने के कारण पॉलिसीमेकर्स अभी फूंक-फूंक कर कदम उठा रहे हैं।
फैसले के पीछे की कहानी
US Federal Open Market Committee (FOMC) ने इस बार ब्याज दरों में कोई बदलाव न करने का निर्णय लिया है। यह फैसला 10-2 के वोटिंग अंतर से लिया गया। केंद्रीय बैंक एक तरफ अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती को देख रहा है, तो दूसरी तरफ 5 साल से महंगाई को 2% के टारगेट पर न ला पाने की चुनौती से भी जूझ रहा है।
कमिटी में असहमति
हालांकि अधिकतर सदस्य दरों को स्थिर रखने के पक्ष में थे, लेकिन फेड गवर्नर Lisa Cook और क्लीवलैंड फेड प्रेसिडेंट Beth Hammack ने असहमति जताई। इन दोनों ने दरों में 0.25% की तत्काल बढ़ोतरी का समर्थन किया, जिससे संकेत मिलता है कि फेड के अंदर भी महंगाई को लेकर चिंताएं कम नहीं हुई हैं।
क्यों चिंता का विषय है महंगाई?
ऊर्जा और डीजल की बढ़ती कीमतें लॉजिस्टिक्स और कृषि सेक्टर के लिए बड़ी मुसीबत बनी हुई हैं। नीति निर्माताओं को डर है कि आम जनता और कंपनियां अब महंगाई को लंबे समय तक जारी रहने वाली मानकर चल रही हैं, जिससे इसे कंट्रोल करना और भी मुश्किल हो सकता है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या है मायने?
US में ऊंची ब्याज दरें ग्लोबल मार्केट पर सीधा असर डालती हैं। जब वहां दरें अधिक होती हैं, तो निवेशक सुरक्षित अमेरिकी एसेट्स की ओर भागते हैं, जिससे भारत जैसे उभरते बाजारों (Emerging Markets) से कैपिटल आउटफ्लो का जोखिम बढ़ जाता है। साथ ही, डॉलर के मुकाबले करेंसी में उतार-चढ़ाव का असर ग्लोबल बिजनेस करने वाली कंपनियों की कमाई पर भी पड़ता है।
आगे क्या रखें ध्यान?
फेड ने साफ कर दिया है कि आगे के फैसले पूरी तरह से आने वाले आंकड़ों पर निर्भर होंगे। निवेशकों की नजर अब अमेरिका के आगामी इन्फ्लेशन और जॉब मार्केट के डेटा पर होनी चाहिए, क्योंकि इन्हीं रिपोर्टों से तय होगा कि 2026 के अंत और 2027 में फेड का रुख क्या रहेगा।
