केंद्र सरकार ने मल्टी-स्टेट कारोबार करने वाले GST टैक्सपेयर्स के लिए फेसलेस असेसमेंट सिस्टम की तैयारी शुरू कर दी है। फाइनेंशियल ईयर **2027-28** तक लागू होने वाली इस व्यवस्था से करीब **2 लाख** कारोबारियों को राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन डेटा सटीकता को लेकर कंपनियों को अलर्ट रहना होगा।
क्या है सरकार का प्लान?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पुष्टि की है कि सरकार GST के तहत एक सेंट्रलाइज्ड, टेक्नोलॉजी-ड्रिवेन प्लेटफॉर्म बनाने जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य ऑडिट, टैक्स नोटिस और शिकायतों का निपटारा बिना किसी फिजिकल इंटरैक्शन (Physical Interaction) के करना है। यह सिस्टम मुख्य रूप से उन करीब 2 लाख टैक्सपेयर्स के लिए है, जो एक से अधिक राज्यों में रजिस्टर्ड हैं।
क्यों लिया गया यह फैसला?
मौजूदा समय में अलग-अलग राज्यों के टैक्स ऑफिसों से निपटना कंपनियों के लिए सिरदर्द बना रहता है। अब इस सेंट्रलाइज्ड मॉडल के आने से पूरे देश में टैक्स मामलों को संभालने में एकरूपता (Uniformity) आएगी। सबसे बड़ी बात यह है कि यह एक सेंट्रल रिफॉर्म है, जिसके लिए GST काउंसिल की अतिरिक्त मंजूरी की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे इसे तेजी से लागू किया जा सकेगा।
कंपनियों के लिए क्या हैं चुनौतियां?
बड़े रिटेलर्स, मैन्युफैक्चरिंग फर्मों और लॉजिस्टिक्स कंपनियों को अपनी कंप्लायंस मैनेजमेंट में बदलाव करना होगा। हालांकि, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के पिछले फेसलेस अनुभवों को देखें तो एक्सपर्ट्स ने कुछ चेतावनियां भी दी हैं। अगर ऑटोमेटेड सिस्टम बिना मानवीय समझ के केवल 'टेम्पलेट-बेस्ड' नोटिस भेजता है, तो मुकदमेबाजी (Litigation) बढ़ने का खतरा हो सकता है।
अब आगे क्या?
सरकार अगले बजट से पहले इस पर एक कंसल्टेशन पेपर जारी करने की तैयारी में है। कंपनियों को सलाह दी गई है कि वे अपनी सभी रजिस्ट्रेशन फाइल्स में डेटा की एक्यूरेसी पर खास ध्यान दें। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस प्लेटफॉर्म में किस तरह के सुरक्षा उपाय (Safeguards) जोड़ती है ताकि तकनीकी खामियों के कारण बिजनेस को परेशानी न हो।
