FPIs की भारतीय शेयरों से भारी निकासी! 2026 में ₹28 अरब डॉलर बाहर, फिर भी Nifty में आई इतनी गिरावट

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorAditya Rao|Published at:
FPIs की भारतीय शेयरों से भारी निकासी! 2026 में ₹28 अरब डॉलर बाहर, फिर भी Nifty में आई इतनी गिरावट

साल 2026 के पहले छह महीनों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय इक्विटी से **$28 अरब डॉलर** की भारी निकासी की है। यह रकम 2025 में हुई कुल निकासी से भी ज़्यादा है। हालांकि, इसके बावजूद Nifty 50 अपने उच्चतम स्तर से केवल **8%** ही गिरा है, जिसका मुख्य कारण म्यूचुअल फंड्स और पेंशन योजनाओं से आया मजबूत घरेलू निवेश है।

विदेशी बिकवाली और घरेलू खरीदारी का अनोखा संगम

भारतीय शेयर बाजार में इस वक्त एक अनोखी स्थिति देखने को मिल रही है। एक तरफ जहां विदेशी निवेशक लगातार बिकवाली कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ घरेलू निवेशक बाजार को संभाले हुए हैं। 2026 के पहले छह महीनों में FPIs ने भारतीय शेयरों से $28 अरब डॉलर निकाले हैं। यह आंकड़ा 2025 में पूरे साल में हुई $19 अरब डॉलर की निकासी से कहीं ज़्यादा है। इस बिकवाली के दबाव के चलते भारतीय रुपये पर भी असर पड़ा है, जिसके कारण 2026-27 के वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में देश के कैपिटल अकाउंट में घाटा देखा गया है।

घरेलू निवेश से संभले बाजार सूचकांक

विदेशी संस्थागत निवेशकों के लगातार बाहर जाने के बावजूद, Nifty 50 जैसे प्रमुख सूचकांक अपने सर्वकालिक उच्च स्तर से केवल 8% ही नीचे हैं। इस स्थिरता का श्रेय काफी हद तक घरेलू पूंजी के मजबूत प्रवाह को जाता है। सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIPs), म्यूचुअल फंड्स और एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन (EPFO) तथा नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) जैसी सरकारी योजनाओं से आने वाला पैसा इक्विटी की कीमतों को सहारा दे रहा है।

कई भारतीय निवेशकों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संपत्तियों में निवेश के विकल्प सीमित हैं। लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) जैसे नियमों के तहत विदेशी निवेश की अनुमति है, लेकिन इसकी प्रक्रियाएं रिटेल निवेशकों के लिए जटिल हो सकती हैं। इसके अलावा, विदेशी शेयरों में म्यूचुअल फंड निवेश की कुल सीमा लंबे समय से $7 अरब डॉलर पर सीमित है। चूंकि घरेलू निवेशकों के पास लंबी अवधि में संपत्ति बनाने के लिए स्थानीय इक्विटी के अलावा कुछ खास विकल्प नहीं हैं, इसलिए बड़ी मात्रा में पूंजी भारतीय बाजार में ही निवेशित रहती है।

वैल्यूएशन और कॉर्पोरेट जोखिम पर असर

इस स्थिति के कारण करेंसी और इक्विटी बाजारों के बीच एक लगातार अंतर बना हुआ है। आमतौर पर, भारी विदेशी बिकवाली से शेयर की कीमतों में बड़ी गिरावट आनी चाहिए। लेकिन, घरेलू निवेशकों के लगातार 'डिप पर खरीदने' (buy-the-dip) के व्यवहार के कारण, विदेशी निवेशक अक्सर अपनी पोजीशन ऊंची वैल्यूएशन पर बेच पाते हैं, जिससे प्राइस-अर्निंग मल्टीपल (P/E ratio) भी ऊंचे बने रहते हैं। अन्य उभरते बाजारों के साथियों की तुलना में, भारतीय शेयर प्रीमियम वैल्यूएशन पर कारोबार कर रहे हैं, जो अंतरराष्ट्रीय संस्थागत निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।

यह माहौल कॉर्पोरेट निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकता है। एक 'कैप्टिव' और सहायक निवेशक आधार के साथ, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय कंपनियों पर बड़े जोखिम लेने या उच्च-विकास वाले नवाचारों को अपनाने का दबाव कम हो सकता है। कुल राजस्व के प्रतिशत के रूप में अनुसंधान और विकास (R&D) पर होने वाला खर्च कई अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कम है, जिसके कारण उन्नत तकनीक और महत्वपूर्ण औद्योगिक घटकों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता बनी हुई है।

निवेशक विदेशी बिकवाली के इस माहौल में घरेलू प्रवाह की स्थिरता पर नजर रख सकते हैं। मुख्य बात यह होगी कि क्या कंपनियां अपने रिटर्न ऑन कैपिटल और नवाचार मेट्रिक्स में सुधार कर पाती हैं, या मौजूदा वैल्यूएशन सपोर्ट आक्रामक पूंजी आवंटन और परिचालन दक्षता को हतोत्साहित करता रहेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.