सितंबर के महीने में Foreign Portfolio Investors (FPIs) ने भारतीय बाजारों से **₹20,974 करोड़** निकाल लिए हैं। इसकी बड़ी वजह अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल और रुपये की कमजोरी है। हालांकि, भारतीय रिटेल निवेशकों के SIP के जरिए **₹31,000 करोड़** से ज्यादा का निवेश बाजार को गिरने से बचा रहा है।
विदेशी निवेशकों का रुख क्यों बदला?
सितंबर में विदेशी निवेशकों (FPIs) ने भारतीय इक्विटी से अपना हाथ खींचना शुरू कर दिया है। 18 सितंबर तक ₹20,974 करोड़ की निकासी देखी गई है। इस बिकवाली के पीछे मुख्य कारण ग्लोबल मार्केट में बदलता समीकरण है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड 5% के करीब बनी हुई है, जो विदेशी निवेशकों को सुरक्षित निवेश की ओर आकर्षित कर रही है। इसके अलावा, डॉलर के मुकाबले रुपये में आ रही गिरावट भी विदेशी फंड्स के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे उनका मुनाफा घट रहा है।
भारतीय बाजार का 'सील्ड कवच'
इतनी भारी बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार में कोई बड़ा क्रैश नहीं देखा गया है। इसका सबसे बड़ा कारण Domestic Institutional Investors की मजबूती है। SIP के जरिए हर महीने ₹31,000 करोड़ से ज्यादा का पैसा बाजार में आ रहा है, जो फॉरेन सेलिंग के झटकों को सहने के लिए एक मजबूत कुशन का काम कर रहा है।
कच्चे तेल की चुनौती
मैक्रो इकोनॉमिक मोर्चे पर चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude) का भाव $100 प्रति बैरल के पार बना रहना महंगाई का खतरा पैदा कर रहा है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर इसका दबाव साफ दिख रहा है, क्योंकि बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों तक तुरंत पास करना कंपनियों के लिए आसान नहीं होता, जिससे मार्जिन पर असर पड़ रहा है।
आगे का रास्ता
फिलहाल मार्केट में 'ग्लोबल कॉशन' और 'डोमेस्टिक ऑप्टिमिज्म' के बीच जंग चल रही है। निवेशकों की नजरें अब कॉरपोरेट अर्निंग्स पर टिकी हैं। अगर कंपनियां अपनी वैल्यूएशन को सही साबित कर पाईं और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आई, तो ही बाजार अपनी तेजी को आगे बढ़ा पाएगा।
