विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने पांच महीने की बिकवाली के बाद जुलाई में भारतीय शेयर बाजार में वापसी की है। उन्होंने कैश मार्केट में ₹6,731 करोड़ का शुद्ध निवेश किया है। डोमेस्टिक फंड्स की खरीदारी और इंडेक्स फ्यूचर्स की एक्टिविटी के सपोर्ट से Nifty ने महीने में 2.17% की बढ़त दर्ज की। आगे FPIs का निवेश पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कम होने और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता पर निर्भर करेगा।
विदेशी निवेशकों का भरोसा लौटा
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने जुलाई महीने में भारतीय शेयर बाजार का रुख पलट दिया है। पांच महीने की लगातार बिकवाली के बाद, FPIs फरवरी के अंत से पहली बार शुद्ध खरीदार बनकर उभरे हैं। उन्होंने भारतीय कैश मार्केट में ₹6,731.97 करोड़ का शुद्ध निवेश किया है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय निवेशक पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष की शुरुआत से ही सतर्क रुख अपनाए हुए थे।
घरेलू फंड्स और फ्यूचर्स का सहारा
बेंचमार्क Nifty 50 इंडेक्स जुलाई के अंत में 24,383.60 पर बंद हुआ, जो कि महीने के हिसाब से 2.17% की बढ़त दर्शाता है। इस रिकवरी में अकेले FPIs का ही हाथ नहीं था। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ने भी लिक्विडिटी प्रदान करना जारी रखा और महीने के दौरान ₹35,099 करोड़ का निवेश किया। हालांकि DIIs की खरीदारी जून के ₹85,800 करोड़ की तुलना में कम थी, फिर भी यह एक महत्वपूर्ण सपोर्ट फैक्टर बनी रही। इसके अलावा, Nifty और Bank Nifty फ्यूचर्स में हुई जबरदस्त शॉर्ट-कवरिंग (जहां ट्रेडर्स बाजार के खिलाफ अपनी पोजीशन को बंद करते हैं) ने भी इंडेक्स को ऊपर ले जाने में मदद की।
इस पॉजिटिव महीने के बावजूद, निवेशकों को सालाना परिदृश्य पर भी ध्यान देना चाहिए। इस साल अब तक, FPIs भारतीय बाजार में ₹2.87 ट्रिलियन की शुद्ध बिकवाली कर चुके हैं। वहीं, DIIs लगातार खरीदारी करते रहे हैं और इसी अवधि में ₹5.05 ट्रिलियन का शुद्ध निवेश दर्ज किया है।
वैश्विक कारकों और AI ट्रेड का प्रभाव
फिलहाल, बाजार की स्थिरता वैश्विक फंड्स के रोटेशन से प्रभावित हो रही है। टेक-हैवी इंडेक्स में हालिया अस्थिरता, जिसमें दक्षिण कोरिया के Kospi में 22% और ताइवान के Taiex में 13% की गिरावट शामिल है, विश्लेषकों को इस बात पर नजर रखने के लिए प्रेरित कर रही है कि क्या पूंजी उन बाजारों से भारत की ओर बढ़ रही है।
एक और महत्वपूर्ण कारक कच्चे तेल की कीमत है। अमेरिका-ईरान संबंधों को लेकर चिंता के बीच जुलाई में ब्रेंट क्रूड 24% बढ़कर $90.12 प्रति बैरल तक पहुंच गया। भारत, जो अपनी तेल की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, के लिए ऊंचे कच्चे तेल की कीमतें अक्सर व्यापार संतुलन और कॉर्पोरेट मुनाफे के मार्जिन पर दबाव डालती हैं। तनाव को कम करने के उद्देश्य से किए जा रहे कूटनीतिक घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर रखी जा रही है, क्योंकि तेल की कीमतों में कोई भी कमी घरेलू बाजारों को और राहत दे सकती है।
निवेशकों के लिए मुख्य निगरानी बिंदु
चल रही रिकवरी के लिए प्राथमिक जोखिम पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति बनी हुई है। विश्लेषकों का सुझाव है कि बाजार वर्तमान में क्षेत्र से आने वाली खबरों के प्रति संवेदनशील है, जो फिर से अस्थिरता पैदा कर सकती है। इसके अलावा, हालांकि इंडेक्स फ्यूचर्स में नेट शॉर्ट पोजीशन में कमी देखी गई है—जून में 256,410 कॉन्ट्रैक्ट से जुलाई के अंत तक 173,113 तक—रैली की निरंतरता इस बात पर निर्भर करेगी कि FPIs अपनी खरीदारी जारी रखते हैं या तनाव बिगड़ने पर फिर से बिकवाली पर लौट आते हैं। आने वाले हफ्तों में बाजार के स्वास्थ्य के शुरुआती संकेतकों के रूप में निवेशकों को वैश्विक तेल मूल्य रुझानों और FPIs के आगे के फ्लो डेटा पर नज़र रखनी चाहिए।
