भारतीय बाजार से विदेशी निवेशकों (FPIs) की निकासी जारी है। इस साल अब तक FPIs ने **$25 बिलियन** के शेयर बेचे हैं, जिससे विदेशी हिस्सेदारी **17 साल** के निचले स्तर पर आ गई है। हालांकि, घरेलू निवेशकों (DIIs) ने **$60 बिलियन** की खरीदारी कर बाजार को संभाला हुआ है।
ग्लोबल शिफ्ट और AI का असर
सितंबर 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) का भारतीय इक्विटी से मोहभंग होता दिख रहा है। इसकी मुख्य वजह ग्लोबल फंड मैनेजरों का 'AI' यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाली कंपनियों की ओर रुख करना है। वे उन बाजारों (जैसे दक्षिण कोरिया और ताइवान) पर दांव लगा रहे हैं जो सेमीकंडक्टर और हार्डवेयर सप्लाई चेन में मजबूत हैं, जिससे भारतीय बाजारों की तुलना में वहां ग्रोथ की अधिक संभावना दिख रही है।
वैल्यूएशन का गणित और इंडेक्स रीबैलेंसिंग
Nifty 50 का फॉरवर्ड P/E रेशियो 17.6 के आसपास है, जो MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स के मुकाबले 77% प्रीमियम पर है। अगस्त 2026 में MSCI इंडेक्स में भारत का वेटेज घटकर 11.29% रह गया, जिससे पैसिव फंड्स ने बिकवाली का दबाव बढ़ा दिया। महंगे वैल्यूएशन के कारण विदेशी निवेशक अब भारतीय शेयरों को कम आकर्षक मान रहे हैं।
घरेलू निवेशकों का दम
विदेशी बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार में भारी गिरावट नहीं देखी गई है, जिसका पूरा श्रेय घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) को जाता है। म्यूचुअल फंड्स और इंश्योरेंस कंपनियों ने इस साल $60 बिलियन का निवेश कर बाजार को एक बड़ा 'कुशन' प्रदान किया है। हालांकि, बाजार का यह पूरा दारोमदार अब डोमेस्टिक लिक्विडिटी पर निर्भर है।
सितंबर की चुनौतियां
जुलाई और अगस्त में उम्मीद की किरण दिखी थी, लेकिन सितंबर में स्थिति फिर बदल गई। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, मजबूत डॉलर और अमेरिका में बढ़ती बॉन्ड यील्ड्स ने भारतीय एसेट्स को डॉलर-आधारित निवेशकों के लिए कम आकर्षक बना दिया है। निवेशकों को आने वाले समय में कंपनी के मुनाफे (Earnings) और करेंसी की चाल पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
