विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने अगस्त महीने में भारतीय शेयर बाजार में **₹23,544 करोड़** का निवेश किया है। यह लगातार दूसरे महीने की खरीदारी है, लेकिन इसके बावजूद FPIs 2026 में अभी भी **₹2.3 ट्रिलियन** से ज्यादा की बिकवाली कर चुके हैं। अब यह देखना होगा कि क्या यह ट्रेंड स्थायी है या सिर्फ एक रणनीति का हिस्सा।
विदेशी निवेशकों की वापसी
अगस्त महीने के 22 तारीख तक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाजार में ₹23,544 करोड़ का शुद्ध निवेश किया है। यह जुलाई में ₹20,200 करोड़ के निवेश के बाद लगातार दूसरा महीना है जब विदेशी फंड्स ने भारतीय बाजार में पैसा लगाया है। यह हालिया खरीदारी बाजार के लिए राहत लेकर आई है, जो साल की शुरुआत से लगातार दबाव में था।
साल 2026 का पूरा आंकड़ा
हालांकि यह इनफ्लो (Inflow) एक अच्छी खबर है, लेकिन इसे पूरे साल के परिप्रेक्ष्य में देखना जरूरी है। FPIs साल 2026 में अभी भी शुद्ध बिकवाल (Net Sellers) बने हुए हैं। उन्होंने जनवरी से अब तक भारतीय इक्विटी से लगभग ₹2.3 ट्रिलियन निकाले हैं। तुलना के लिए, यह रकम 2025 के पूरे कैलेंडर वर्ष में निकाले गए ₹1.66 ट्रिलियन से भी ज्यादा है। इसका मतलब है कि हालिया खरीदारी के बावजूद, साल के अधिकांश समय में विदेशी संस्थागत पैसा बाजार से बाहर जा रहा है।
चुनिंदा खरीदारी का जोर
बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि FPIs की मौजूदा खरीदारी व्यापक, लंबी अवधि के बदलाव के बजाय एक रणनीतिक (Tactical) कदम ज्यादा लगती है। वे बड़े बैंक या आईटी शेयरों में आक्रामक तरीके से पैसा लगाने के बजाय चुनिंदा कंपनियों में निवेश कर रहे हैं। खासकर मिड-कैप कंपनियों पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, भले ही उनकी वैल्यूएशन (Valuation) महंगी लग रही हो। इस चुनिंदा खरीदारी के पीछे पहली तिमाही में कॉरपोरेट आय में सुधार और मजबूत होते रुपये का हाथ है, जिससे विदेशी निवेशकों का करेंसी जोखिम कम होता है।
वैश्विक कारक बने हुए हैं असरदार
कई बाहरी कारक इन निवेश निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं। अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर उम्मीदें, उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी के प्रवाह को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती हैं। निवेशक भू-राजनीतिक घटनाओं पर भी करीब से नजर रख रहे हैं, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, जो अचानक अस्थिरता पैदा कर सकता है। इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतें एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई हैं; अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो यह भारतीय रुपये और कॉर्पोरेट मुनाफे पर दबाव डाल सकती हैं, जिससे बाजार की भावना को नुकसान हो सकता है।
डेट मार्केट में भी चुनिंदा रुचि
इक्विटी के अलावा, FPIs ने भारतीय डेट मार्केट (Debt Market) में भी चुनिंदा रुचि दिखाई है। अगस्त में, उन्होंने फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के जरिए ₹852 करोड़ का निवेश किया। हालांकि, यह रुचि अन्य सेगमेंट में हो रहे आउटफ्लो (Outflow) से संतुलित हो रही है, जो भारतीय संपत्तियों के प्रति सतर्क दृष्टिकोण को दर्शाता है।
आगे क्या?
निवेशकों के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह इनफ्लो आने वाले महीनों में जारी रहता है। हालांकि हालिया रुझान उत्साहजनक है, साल-दर-तारीख (Year-to-Date) कुल आउटफ्लो अभी भी अधिक है। बाजार प्रतिभागी संभवतः लगातार निवेश पैटर्न, वैश्विक ब्याज दरों पर अपडेट और कमोडिटी मूल्य रुझानों पर नजर रखेंगे ताकि यह समझा जा सके कि भावना में यह बदलाव कितना टिकाऊ होगा।
