IIFL कैपिटल की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में FPIs (विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक) पर लगने वाले कैपिटल गेन टैक्स (Capital Gains Tax) के कारण निवेशकों को सालाना **2.4%** तक का नुकसान हो रहा है। सरकार जहां विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए नए कदम उठा रही है, वहीं इक्विटी निवेशकों के लिए टैक्स का बोझ एक बड़ी चिंता बना हुआ है।
FPIs के लिए टैक्स का गणित
IIFL कैपिटल की एक नई रिपोर्ट ने भारत में विदेशी निवेशकों के लिए टैक्स के मुद्दे को फिर से गरमा दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) पर लगने वाले कैपिटल गेन टैक्स (Capital Gains Tax) की वजह से निवेशकों को हर साल 2.4% तक का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस टैक्स के चलते भारत, दुनिया के दूसरे बड़े बाजारों की तुलना में कम आकर्षक बन रहा है।
सरकार के प्रयास और चिंताएं
हालांकि, सरकार भी विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए कई कदम उठा रही है। इसी कड़ी में, सरकार ने 2.4% तक के रिटर्न पर असर डालने वाले इस टैक्स के मसले पर ध्यान दिया है। पिछले दिनों, जून 2026 में, सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश करने वाले FPIs के लिए कैपिटल गेन और ब्याज आय पर लगने वाले टैक्स को खत्म कर दिया था। इसके बाद, 4 अगस्त, 2026 को सरकार ने लोकसभा में 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026' पेश किया। इस बिल का मुख्य उद्देश्य डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और ऑफशोर इन्वेस्टमेंट फंड्स जैसे क्षेत्रों में विदेशी निवेश को और बढ़ावा देना है।
क्यों भारत है 'आउटलायर'?
IIFL की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के बड़े वित्तीय केंद्रों जैसे यूके, सिंगापुर, अमेरिका और यूएई में आम तौर पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों पर कैपिटल गेन टैक्स नहीं लगाया जाता है। लेकिन भारत में लॉन्ग-टर्म और शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन टैक्स की व्यवस्था एक 'स्ट्रक्चरल फ्रिक्शन' यानी संरचनात्मक बाधा पैदा करती है।
निवेशकों पर दोहरा असर
यह बाधा विदेशी फंड्स को दो तरह से प्रभावित करती है:
- डेली टैक्स प्रोविज़न: कई फंड्स को अभी तक कमाए नहीं गए मुनाफे (unrealized gains) पर भी रोज़ाना टैक्स का प्रावधान करना पड़ता है। इससे उनके नेट एसेट वैल्यू (NAV) में कमी आती है, भले ही उन्होंने असल में कोई पैसा चुकाया न हो।
- होम कंट्री क्रेडिट में दिक्कत: कई विदेशी निवेशक अपने देश में इस भारतीय टैक्स का क्रेडिट (credit) क्लेम करने में संघर्ष करते हैं। इसका मतलब है कि यह टैक्स का बोझ सीधे भारत सरकार के खजाने में चला जाता है, और निवेशक को इसका कोई फायदा नहीं मिल पाता।
इन सब वजहों से, भारत-केंद्रित एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) और उनके बेंचमार्क के बीच प्रदर्शन का अंतर, दूसरे प्रमुख वैश्विक बाजारों के ETFs की तुलना में बढ़ गया है।
आगे क्या?
निवेशकों के लिए यह स्थिति मिली-जुली है। एक तरफ, सरकार नए बिल के जरिए भारत को विदेशी पूंजी के लिए एक आकर्षक गंतव्य बनाने की कोशिश कर रही है। वहीं, ब्रोकरेज रिपोर्ट यह भी बताती है कि इक्विटी निवेशकों के लिए अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं। भविष्य में विदेशी पूंजी का प्रवाह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार इन इक्विटी-विशिष्ट चिंताओं को कैसे दूर करती है।
