FPI की हिस्सेदारी 17 साल के निचले स्तर पर, घरेलू फंड्स का दबदबा बढ़ा

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
FPI की हिस्सेदारी 17 साल के निचले स्तर पर, घरेलू फंड्स का दबदबा बढ़ा

भारतीय इक्विटी मार्केट में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की हिस्सेदारी 17 साल के निचले स्तर यानी **15.1%** पर आ गई है। लगातार बिकवाली के चलते ऐसा हुआ है। वहीं, डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ने म्यूचुअल फंड में रिकॉर्ड **11.6%** हिस्सेदारी के साथ अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। यह एक बड़ा बदलाव है जो दिखाता है कि लोकल कैपिटल ग्लोबल मार्केट की अस्थिरता को झेलने में अहम भूमिका निभा रहा है।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय इक्विटी में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 17 साल के सबसे निचले स्तर 15.1% पर ला दी है। साल 2026 में FPIs ने लगभग $15.1 बिलियन की इक्विटी बेची है। एक समय भारतीय बाजार की चाल तय करने वाले विदेशी निवेशक अब कम हो गए हैं।

डोमेस्टिक फंड्स की मजबूत एंट्री

विदेशी बिकवाली के इस दबाव को घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने संभाला है। डोमेस्टिक म्यूचुअल फंड्स ने लगातार 12 तिमाहियों से अपनी होल्डिंग बढ़ाई है और अब यह रिकॉर्ड 11.6% पर पहुंच गई है। अन्य डोमेस्टिक संस्थागत निवेशकों को मिलाकर, DIIs की कुल हिस्सेदारी बढ़कर 19.5% हो गई है। यह लगातार 7वीं तिमाही है जब डोमेस्टिक निवेशकों की हिस्सेदारी विदेशी निवेशकों से ज्यादा रही है। यह अंतर साल 2001 के बाद सबसे बड़ा है।

घर-घर से आ रहा पैसा

डोमेस्टिक निवेशकों के इस दबदबे की एक बड़ी वजह है लोगों के पैसों का वित्तीयकरण (financialization)। रिटेल निवेशकों की भागीदारी, चाहे सीधे हो या अप्रत्यक्ष रूप से, रिकॉर्ड 19.3% पर पहुंच गई है। सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIPs) में लगातार आ रहे पैसों की वजह से म्यूचुअल फंड्स को तब भी खरीदारी करने की लिक्विडिटी मिल जाती है, जब विदेशी निवेशक बिकवाली करते हैं। इस लोकल बाइंग पावर ने बाजार पर विदेशी बिकवाली के असर को कम किया है।

मिड और स्मॉल कैप की ओर झुकाव

इंस्टीट्यूशनल निवेशक अब बड़े शेयरों (large-cap stocks) से हटकर मिड-कैप और स्मॉल-कैप सेगमेंट में मौके तलाश रहे हैं। निफ्टी 50 इंडेक्स का कुल संस्थागत आवंटन (institutional allocation) घटकर 56.1% रह गया है। इसका मतलब है कि प्रोफेशनल फंड मैनेजर्स टॉप 50 कंपनियों से आगे ग्रोथ के मौके ढूंढ रहे हैं।

FPIs की वापसी की उम्मीद?

हालांकि, विदेशी बिकवाली का ट्रेंड रहा है, लेकिन जुलाई और अगस्त 2026 में FPIs ने भारतीय बाजार में वापसी के संकेत दिए हैं। अच्छी कॉरपोरेट कमाई (corporate earnings) और अमेरिका में ब्याज दरों में कटौती (interest rate cuts) की उम्मीदों ने उन्हें आकर्षित किया है। हालांकि, उनका भविष्य ग्लोबल इकोनॉमिक फैक्टर्स पर निर्भर करेगा।

आगे क्या?

निवेशकों के लिए यह देखना अहम होगा कि क्या डोमेस्टिक सपोर्ट तब भी बना रहता है, जब बाजार में ज्यादा उतार-चढ़ाव आता है। डोमेस्टिक फंड्स का रिकॉर्ड इजाफा भले ही बाहरी झटकों से बचाता हो, लेकिन मिड-कैप और स्मॉल-कैप पर निर्भरता में जोखिम भी है। ऐसे में SIP फ्लो और FPIs की नेट बाइंग-सेलिंग ट्रेंड पर नजर रखना जरूरी होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.