Tata Sons के अंदरूनी नेतृत्व विवाद पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। सरकार ने इसे निजी मामला बताते हुए हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है, जिससे अब सभी की निगाहें **26 नवंबर** को होने वाली बोर्ड मीटिंग पर टिकी हैं।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मुंबई में साफ कर दिया है कि Tata Sons में चल रहे नेतृत्व और गवर्नेंस विवाद में सरकार किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह पूरी तरह से एक निजी कॉर्पोरेट मामला है, जिसे कंपनी के नेतृत्व को खुद सुलझाना होगा।
विवाद की मुख्य वजहें
इस समय Tata Trusts के प्रमुख नोएल टाटा और Tata Sons के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के बीच मतभेद की खबरें सुर्खियों में हैं। चर्चा के केंद्र में मुख्य रूप से दो बड़े मुद्दे हैं: पहला, एन. चंद्रशेखरन की चेयरमैन पद पर दोबारा नियुक्ति और दूसरा, RBI के नियमों के तहत Tata Sons की अनिवार्य पब्लिक लिस्टिंग। स्थिति तब और पेचीदा हो गई जब वरिष्ठ अधिवक्ता डेरियस खंबाटा ने ट्रस्टी के रूप में पुनर्नियुक्ति से इनकार कर दिया, जिससे कंपनी की साख को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
निवेशकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस अनिश्चितता का असर टाटा ग्रुप की उन कंपनियों पर न पड़े जो शेयर बाजार में लिस्टेड हैं। TCS, Tata Motors और Tata Steel जैसी दिग्गज कंपनियों का प्रदर्शन सीधे तौर पर Tata Sons की स्थिरता से जुड़ा हुआ है। हालांकि अभी तक बाजार नियामक SEBI भी इस पूरे मामले पर कड़ी नजर बनाए हुए है।
अब सबकी नजरें 26 नवंबर, 2026 को होने वाली बोर्ड मीटिंग पर हैं। इस बैठक में गवर्नेंस और रीस्ट्रक्चरिंग से जुड़े अहम प्रस्तावों पर चर्चा की उम्मीद है। बाजार के जानकारों का मानना है कि इस मीटिंग के नतीजे ही ग्रुप की भविष्य की दिशा और लिस्टिंग की समय-सीमा तय करेंगे।
