वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने BRICS समिट के दौरान Asian Infrastructure Investment Bank (AIIB) के प्रेसिडेंट से मुलाकात की। इस बैठक में मुख्य फोकस बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए फंड जुटाने और लोकल-करेंसी फाइनेंसिंग को बढ़ावा देने पर रहा, ताकि भारतीय कंपनियों को विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाया जा सके।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और Asian Infrastructure Investment Bank (AIIB) के प्रमुख के बीच हुई यह बैठक भारत के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। सरकार का मुख्य मकसद देश में सड़क, रेलवे और पोर्ट्स के निर्माण के लिए अफोर्डेबल और निरंतर पूंजी (Capital) सुनिश्चित करना है।
लोकल-करेंसी फाइनेंसिंग पर जोर
सबसे अहम बात यह है कि सरकार अब विदेशी कर्ज के बजाय लोकल-करेंसी फाइनेंसिंग पर ध्यान दे रही है। फिलहाल, कई कंपनियां US डॉलर में लोन लेती हैं, जिससे रुपये के गिरने पर उन पर ब्याज का बोझ बढ़ जाता है। रुपये में लोन मिलने से इंफ्रा कंपनियों को करेंसी फ्लक्चुएशन से सुरक्षा मिलेगी और लॉन्ग-टर्म प्रोजेक्ट्स में स्थिरता आएगी।
प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी
बैठक में प्राइवेट सेक्टर को इन बड़े प्रोजेक्ट्स से जोड़ने पर भी मंथन हुआ। सरकार AIIB के काम करने के तरीके में बदलाव लाकर इसे निवेशकों के लिए और आकर्षक बनाना चाहती है, ताकि ट्रांसपोर्ट और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स के लिए फंड की कमी न हो।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
अगर AIIB जैसे बड़े मल्टीलेटरल बैंक लोकल-करेंसी फाइनेंसिंग को बढ़ावा देते हैं, तो इससे प्रोजेक्ट्स समय पर पूरे होने की उम्मीद बढ़ेगी। कंस्ट्रक्शन सेक्टर की कंपनियों के लिए फंड की अड़चनें कम होंगी, जो उनके मुनाफे के लिए एक पॉजिटिव संकेत है। हालांकि, निवेशकों को अब यह देखना होगा कि ये नीतियां जमीन पर कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से लागू होती हैं, क्योंकि प्रोजेक्ट्स की सफलता लैंड एक्विजिशन और रॉ मटीरियल की उपलब्धता पर भी निर्भर करती है।
