FIIs ने अगस्त में की भारतीय बाज़ारों में खरीदारी, पर रिटर्न की राह मुश्किल

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
FIIs ने अगस्त में की भारतीय बाज़ारों में खरीदारी, पर रिटर्न की राह मुश्किल

अगस्त 2026 में विदेशी निवेशकों (FIIs) की रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। ऊंचे रिटर्न की राह मुश्किल होने के बावजूद, FIIs ने भारतीय इक्विटी में **₹16,000 करोड़** से ज़्यादा की नेट खरीदारी की है। यह इस साल की शुरुआत में देखी गई बिकवाली के ट्रेंड से बिलकुल उलट है।

11.8% रिटर्न हर्डल की चुनौती

विदेशी फंड्स के लिए उभरते बाज़ारों में निवेश का फैसला आसान नहीं है। वे अपनी कमाई की तुलना अमेरिका के सेफ माने जाने वाले ट्रेजरी बॉन्ड्स से करते हैं। मौजूदा समय में, अमेरिकी 10-साल के बॉन्ड पर यील्ड करीब 4.7% है, जिसमें रिस्क प्रीमियम को भी जोड़ दें तो भारतीय इक्विटी से डॉलर टर्म्स में कम से कम 11.8% का रिटर्न मिलना ज़रूरी है। इसमें यह उम्मीद भी शामिल है कि भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले गिरेगा, जिससे विदेशी निवेशकों का फाइनल प्रॉफिट कम हो सकता है। क्योंकि भारत के बेंचमार्क इंडेक्स से उम्मीद से कम रिटर्न मिल रहा है, इसलिए कुछ ग्लोबल स्ट्रेटेजिस्ट्स ने वैल्यूएशन प्रीमियम को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है।

FIIs की हिस्सेदारी और DIIs का सहारा

2026 के मध्य के आंकड़ों के मुताबिक, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर लिस्टेड कंपनियों में FIIs की हिस्सेदारी घटकर 15.1% से 15.8% के बीच आ गई है, जो पिछले 17 सालों का सबसे निचला स्तर है। यह गिरावट साल की पहली छमाही में हुए बड़े आउटफ्लो का नतीजा है। हालांकि, इस विदेशी बिकवाली के बावजूद भारतीय बाज़ार में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई है। इसकी मुख्य वजह डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) हैं, जिनमें म्यूचुअल फंड्स और इंश्योरेंस कंपनियां शामिल हैं। इन घरेलू निवेशकों ने खरीदारी बढ़ाकर बाज़ार को संभाला है। भारतीय निवेशकों द्वारा म्यूचुअल फंड्स में लगातार सेविंग्स के फ्लो ने विदेशी बिकवाली के दबाव को झेलने के लिए ज़रूरी लिक्विडिटी प्रदान की है।

वैल्यूएशन और आगे क्या?

ग्लोबल निवेशकों के सतर्क रवैये का एक बड़ा कारण यह है कि भारतीय इक्विटी अक्सर दूसरे उभरते बाज़ारों की तुलना में ज़्यादा वैल्यूएशन पर ट्रेड करती है। इसका मतलब है कि निवेशक कमाई के हर रुपये के लिए ज़्यादा कीमत चुकाते हैं। हालांकि यह प्रीमियम भारत की लॉन्ग-टर्म ग्रोथ पर भरोसे को दिखाता है, पर यह बाज़ार को ग्लोबल इंटरेस्ट रेट में बदलाव के प्रति ज़्यादा संवेदनशील बनाता है। अगर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ऊंचे बने रहते हैं या और बढ़ते हैं, तो 11.8% का रिटर्न हर्डल ग्लोबल फंड मैनेजर्स के लिए चर्चा का विषय बना रहेगा।

निवेशकों के लिए, आगे चलकर अमेरिकी ब्याज दरों का रुख और फेडरल रिजर्व की कमेंट्री सबसे महत्वपूर्ण रहेगी, क्योंकि ये सीधे बॉन्ड यील्ड्स को प्रभावित करती हैं और इसी से उभरते बाज़ारों के लिए हर्डल रेट तय होता है। इसके अलावा, FIIs की हालिया खरीदारी का ट्रेंड कितना टिकाऊ रहेगा, यह भारत में क्वार्टरली अर्निंग ग्रोथ और विदेशी आउटफ्लो को अवशोषित करने में डोमेस्टिक म्यूचुअल फंड्स की क्षमता पर निर्भर करेगा। निवेशकों को इन मंथली फ्लो पैटर्न और कॉर्पोरेट परफॉरमेंस रिपोर्ट्स पर नज़र रखनी चाहिए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.