FII की वापसी: विदेशी निवेशकों का भारतीय इक्विटी में लौटा रुझान

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
FII की वापसी: विदेशी निवेशकों का भारतीय इक्विटी में लौटा रुझान

साल 2026 की शुरुआत में भारी बिकवाली के बाद, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयरों में फिर से दिलचस्पी दिखाई है। वजह है शेयर बाजार के वैल्यूएशन (Valuation) का ठंडा पड़ना और कंपनियों के मुनाफे (Earnings) की उम्मीदों का स्थिर होना। इस दौरान, घरेलू निवेशकों ने लिक्विडिटी (Liquidity) बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है।

FIIs का बदलता मिजाज

भारतीय इक्विटी मार्केट में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के सेंटीमेंट (Sentiment) में एक बड़ा बदलाव आता दिख रहा है। इस साल की शुरुआत में जहां FIIs ने भारतीय शेयरों से करीब ₹2.3 लाख करोड़ की बिकवाली की थी, वहीं जुलाई और अगस्त 2026 के आंकड़े एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत दे रहे हैं। विदेशी पूंजी की वापसी शुरू हो गई है, जिसमें अगस्त में ₹23,544 करोड़ का नेट इनफ्लो (Net Inflow) दर्ज किया गया। इससे लगता है कि ग्लोबल निवेशक भारत के प्रति अपने रुख पर पुनर्विचार कर रहे हैं।

क्यों लौट रहे हैं विदेशी निवेशक?

इस बदलाव की मुख्य वजह भारत की ग्रोथ को देखने का नजरिया है। एनालिस्ट्स (Analysts) का कहना है कि मार्केट अब हाई वैल्यूएशन (High Valuation) और कम विजिबिलिटी (Low Visibility) वाले दौर से निकल रहा है। फिलहाल, भारत का 12-महीने का फॉरवर्ड प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो (Ratio) घटकर करीब 20 गुना हो गया है, जो पिछले 10 सालों के औसत के करीब है। यह बेहतर वैल्यूएशन और कॉर्पोरेट मुनाफे की स्पष्ट उम्मीदें विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर रही हैं।

डोमेस्टिक निवेशकों का सहारा

जब FIIs बिकवाली कर रहे थे, तब डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) एक मजबूत सहारे के तौर पर उभरे। सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIPs) के जरिए लगातार आ रहे पैसों से DIIs पूरे 2026 में नेट बायर्स (Net Buyers) बने रहे। उन्होंने कुल मिलाकर ₹5.13 लाख करोड़ से ज्यादा की खरीदारी की। इस घरेलू सपोर्ट ने मार्केट की अस्थिरता को कम किया और लिक्विडिटी बनाए रखी।

आगे का रास्ता और जोखिम

हालिया सकारात्मक रुझान के बावजूद, निवेशकों को कुछ जोखिमों पर भी ध्यान देना चाहिए। भू-राजनीतिक तनाव, खासकर कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित करने वाले क्षेत्रों में, आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा बने हुए हैं। इसके अलावा, अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की ब्याज दरों में कोई भी अप्रत्याशित बदलाव डॉलर को मजबूत कर सकता है और भारत जैसे उभरते बाजारों में अस्थिरता ला सकता है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू कॉर्पोरेट नतीजों पर निर्भरता है। वर्तमान उम्मीदें इस आधार पर टिकी हैं कि भारतीय कंपनियां अच्छा मुनाफा कमाना जारी रखेंगी। अगर आने वाले नतीजों में कमजोरी दिखती है, या कंज्यूमर कॉन्फिडेंस (Consumer Confidence) कम होता है, तो यह तस्वीर बदल सकती है। निवेशकों को FII इनफ्लो की निरंतरता, रुपये की स्थिरता और आने वाली तिमाहियों में कॉर्पोरेट नतीजों पर कड़ी नजर रखनी होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.