Federation of Indian Export Organisations (FIEO) ने सरकार से इन-हाउस टेस्टिंग की अनुमति मांगी है। इस कदम से कंपनियों का **₹12 लाख** तक का सालाना खर्च बच सकता है और शिपमेंट में होने वाली देरी पर भी लगाम लगेगी।
खर्च में होगी भारी कटौती
वर्तमान में, भारतीय निर्यातकों को अपने प्रोडक्ट की टेस्टिंग के लिए बाहरी लैब्स पर निर्भर रहना पड़ता है। FIEO के डेटा के अनुसार, कंपनियां प्रति यूनिट सालाना ₹10 लाख से ₹12 लाख तक केवल टेस्टिंग फीस पर खर्च कर रही हैं। यदि सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो यह बचत सीधे कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन में जुड़ेगी। खास तौर पर टेक्सटाइल, केमिकल और इंजीनियरिंग जैसे सेक्टर, जहाँ मार्जिन काफी कम होता है, वहां यह बदलाव गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
क्यों जरूरी है यह बदलाव?
मौजूदा सिस्टम में टेस्टिंग के लिए बाहरी लैब्स पर निर्भरता के कारण लॉजिस्टिकल बाधाएं आती हैं, जिससे एक्सपोर्ट में देरी होती है। इन-हाउस टेस्टिंग न केवल प्रोडक्शन से शिपमेंट तक के समय को कम करेगी, बल्कि कंपनियों के प्रोप्रायटरी डिजाइन्स की सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगी, क्योंकि सेंसिटिव जानकारी बाहर साझा नहीं करनी पड़ेगी।
क्या हैं चुनौतियां?
हालांकि यह प्रस्ताव आकर्षक है, लेकिन इसमें जोखिम भी हैं। अमेरिका और यूरोपीय यूनियन जैसे सख्त रेगुलेटरी मार्केट में अंतरराष्ट्रीय क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को बनाए रखना बड़ी चुनौती है। यदि सरकार इस पर आगे बढ़ती है, तो निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या इन लैब्स को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता (Accreditation) मिलेगी। बिना कड़े क्वालिटी ऑडिट के, यह कदम ब्रांड की साख और प्रोडक्ट रिजेक्शन का कारण भी बन सकता है।
फिलहाल, बाजार की नजर इस बात पर है कि सरकार का इस पर क्या रुख रहता है और वे किस तरह का कंप्लायंस फ्रेमवर्क तैयार करते हैं, जो एक्सपोर्ट की गति और क्वालिटी दोनों को बैलेंस कर सके।
