FAO की 2026 की ताजा रिपोर्ट ने कृषि जगत में हड़कंप मचा दिया है। ग्लोबल स्तर पर **58%** इलाकों में मिट्टी की गुणवत्ता गिरी है, जबकि भारत की **30%** जमीन डीग्रेडेड (Degraded) हो चुकी है। यह चिंताजनक ट्रेंड सरकार की फर्टिलाइजर सब्सिडी पॉलिसी में बड़े बदलाव ला सकता है।
मिट्टी की सेहत और ग्लोबल एग्रीकल्चर का गणित
FAO (Food and Agriculture Organization) की 2026 की रिपोर्ट ने ग्लोबल फूड सिक्योरिटी को लेकर खतरे की घंटी बजा दी है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि 2015 के बाद से दुनिया के 58% हिस्सों में मिट्टी की क्वालिटी तेजी से खराब हुई है, जबकि सुधार केवल 10% इलाकों में ही देखा गया है। कृषि पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह एक बड़ा आर्थिक संकट बन सकता है।
भारत के लिए चुनौती
भारत की स्थिति फिलहाल काफी चिंताजनक है। देश की कुल भूमि का लगभग 30% यानी करीब 9.78 करोड़ हेक्टेयर जमीन डीग्रेडेड श्रेणी में आ चुकी है। हमारा मौजूदा कृषि मॉडल नाइट्रोजन-आधारित फर्टिलाइजर पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जिसे भारी सरकारी सब्सिडी मिलती है। हालांकि इससे प्रोडक्शन तो बना रहा, लेकिन मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ गया है।
निवेशकों के लिए पॉलिसी रिस्क
इन्वेस्टर्स के लिए बड़ी चुनौती यह है कि सरकार आने वाले समय में सब्सिडी के ढांचे में बदलाव कर सकती है। यदि सरकार मौजूदा यूरिया-आधारित सब्सिडी को कम करके मिट्टी की सेहत और 'रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर' की ओर फंड डायवर्ट करती है, तो पारंपरिक फर्टिलाइजर कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ सकता है। जो कंपनियां समय रहते अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो में बदलाव नहीं कर पाएंगी, उनके लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
भविष्य की राह और जोखिम
अब ग्लोबल स्तर पर UNCCD और FAO जैसी संस्थाएं प्राइवेट कैपिटल को लैंड मैनेजमेंट प्रोजेक्ट्स की ओर खींचने की कोशिश कर रही हैं। यह उन कंपनियों के लिए एक अवसर भी है जो सस्टेनेबल इनपुट्स (Sustainable Inputs) पर काम कर रही हैं। निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि अगर मिट्टी की उत्पादकता घटती है, तो फूड इन्फ्लेशन बढ़ेगी और ग्रामीण मांग पर दबाव दिखेगा। साथ ही, सब्सिडी में किसी भी बड़े बदलाव का सीधा असर सेक्टर की दिग्गज कंपनियों की कमाई पर पड़ेगा। सरकार के अगले कुछ तिमाही के ऐलान इस सेक्टर की दिशा तय करेंगे।
