Food and Agriculture Organization (FAO) ने चेतावनी दी है कि पशुओं के लिए हर्बल दवाओं के इस्तेमाल में क्वालिटी और रेगुलेशन की कमी सबसे बड़ी रुकावट है। हालांकि, भारत के National Dairy Development Board (NDDB) ने इसे **10 लाख** से ज्यादा मामलों में सफलतापूर्वक लागू करके एक नया रास्ता दिखाया है।
चुनौती क्या है?
FAO का मानना है कि पारंपरिक हर्बल दवाएं एंटीबायोटिक्स का एक बेहतरीन विकल्प बन सकती हैं, लेकिन इनके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में 'स्टैंडर्डाइजेशन' और 'साइंटिफिक वैलिडेशन' की कमी है। प्राकृतिक अर्क (plant extracts) की ताकत भौगोलिक स्थिति और मौसम के हिसाब से बदलती रहती है, जिससे एक ऐसा प्रोडक्ट बनाना मुश्किल हो जाता है जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल सके।
भारत का सफल मॉडल
इन ग्लोबल चुनौतियों के बीच, भारत ने 'एथनोवेटरिनरी' (Ethnoveterinary) मेडिसिन के जरिए एक मिसाल कायम की है। National Dairy Development Board और Department of Animal Husbandry and Dairying के प्रयासों से मार्च 2025 तक 11 लाख से अधिक पशु उपचार किए गए हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इन प्रोग्राम्स में 80% से ज्यादा सफलता दर देखी गई है। यह साबित करता है कि अगर वैज्ञानिक तरीके से इनका इस्तेमाल हो, तो ये कमर्शियल डेयरी के लिए बेहद प्रभावी हैं।
निवेशकों और सेक्टर के लिए क्या है संकेत?
इस सेक्टर में निवेश का बड़ा अवसर है, लेकिन इसकी राह रेगुलेटरी स्पष्टता से होकर गुजरती है। जब तक कच्चा माल, अर्क और मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस के लिए कोई वैश्विक ढांचा नहीं बनता, तब तक यह मार्केट मुख्य रूप से लोकल बना रहेगा। निवेशकों को उन कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जो हर्बल दवाओं के लिए सख्त साइंटिफिक टेस्टिंग और रेगुलेटरी क्लीयरेंस की दिशा में काम कर रही हैं।
