RoDTEP और RoSCTL जैसी अहम एक्सपोर्ट रिबेट स्कीमों के भविष्य को लेकर फाइनेंस और कॉमर्स मिनिस्ट्री के बीच खींचतान चल रही है। ये स्कीमें **31 दिसंबर** को खत्म हो रही हैं, जिससे टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग जैसे सेक्टरों के लिए अनिश्चितता पैदा हो गई है।
भारत के एक्सपोर्ट सेक्टर के लिए एक बड़ी पॉलिसी डेडलॉक की स्थिति बन गई है। सरकारी रिबेट स्कीम—Remission of Duties and Taxes on Exported Products (RoDTEP) और Rebate of State and Central Taxes and Levies (RoSCTL)—की समय सीमा 31 दिसंबर को समाप्त होने वाली है। जहां कॉमर्स डिपार्टमेंट 5 साल के विस्तार की मांग कर रहा है, वहीं फाइनेंस मिनिस्ट्री इसके वित्तीय बोझ को लेकर फूंक-फूंक कर कदम उठा रही है।
प्रॉफिट मार्जिन के लिए क्यों जरूरी है ये रिबेट?
कई भारतीय कंपनियों के लिए, ये केवल सरकारी इंसेंटिव नहीं, बल्कि कच्चे माल और लॉजिस्टिक्स पर लगे उन टैक्स का रिफंड है जो एक्सपोर्ट के दौरान वसूले जाते हैं। इन रिफंड्स के बिना, भारतीय उत्पाद ग्लोबल मार्केट में महंगे हो जाते हैं। टेक्सटाइल, केमिकल और इंजीनियरिंग सेक्टर की कंपनियों के ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन के लिए ये रिबेट एक सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं। अनिश्चितता के कारण कंपनियां लंबे समय के इंटरनेशनल कॉन्ट्रैक्ट्स की सही प्राइसिंग नहीं कर पा रही हैं।
बजटीय खींचतान और कॉम्पिटिटिवनेस
कॉमर्स डिपार्टमेंट ने 2026-27 के लिए ₹23,000 करोड़ के बजट का प्रस्ताव रखा है, जो मौजूदा ₹10,000 करोड़ के अनुमान से काफी अधिक है। उनका तर्क है कि चालू फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही में मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में 18.51% की बढ़ोतरी (कुल $259.89 बिलियन) को बनाए रखने के लिए यह जरूरी है। वहीं, फाइनेंस मिनिस्ट्री इस बात पर सवाल उठा रही है कि क्या ये प्रोग्राम वास्तव में एक्सपोर्ट ग्रोथ को लॉन्ग-टर्म सपोर्ट दे रहे हैं।
निवेशकों के लिए जोखिम (Investor Monitorables)
इन्वेस्टर्स को यह देखना होगा कि टेक्सटाइल और लेदर जैसे लेबर-इंटेंसिव सेक्टर की कंपनियां अगर इन स्कीमों में कटौती होती है, तो खुद को कैसे ढालती हैं। यदि इन रिबेट्स को हटाया जाता है, तो कंपनियों को इन टैक्सेज का बोझ खुद उठाना पड़ेगा, जिससे उनके मार्जिन पर दबाव आ सकता है। 31 दिसंबर तक सरकार का अंतिम फैसला इस पूरे सेक्टर की दिशा तय करेगा।
