पूर्व RBI गवर्नर डी. सुब्बाराव ने भारतीय रुपया (Indian Rupee) की कमजोरी को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने इसे अस्थायी नहीं बल्कि एक स्ट्रक्चरल समस्या बताया है, जो ग्लोबल कैपिटल के टेक-ड्रिवन मार्केट्स की ओर शिफ्ट होने के कारण हो रही है।
ग्लोबल कैपिटल का बदलता रुख
पूर्व RBI गवर्नर डी. सुब्बाराव के मुताबिक, रुपए पर दबाव का असली कारण केवल कच्चा तेल या भू-राजनीतिक तनाव नहीं है। अब दुनिया भर का पैसा उन मार्केट्स की ओर जा रहा है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सेमीकंडक्टर जैसी नई तकनीकों में लीडर हैं। चूंकि भारतीय अर्थव्यवस्था में इन क्षेत्रों का हिस्सा अभी कम है, इसलिए विदेशी निवेशक बेहतर अवसरों की तलाश में अन्य देशों का रुख कर रहे हैं। साथ ही, भारतीय बाजारों का महंगा वैल्यूएशन भी निवेशकों को अधिक सिलेक्टिव बना रहा है।
भारतीय शेयरों पर असर
रुपए की कमजोरी का असर भारतीय कंपनियों पर दो तरह से पड़ रहा है। जो कंपनियां बड़ी मात्रा में कच्चा माल इंपोर्ट (Import) करती हैं, उनके मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है। इसमें ऑयल मार्केटिंग कंपनियां, पेंट्स और एफएमसीजी सेक्टर प्रमुख हैं। इसके विपरीत, IT और फार्मा जैसी एक्सपोर्ट (Export) आधारित कंपनियों को कुछ सपोर्ट मिल सकता है, क्योंकि डॉलर में कमाई से उनकी रुपए में वैल्यू बढ़ जाती है। हालांकि, सुब्बाराव ने स्पष्ट किया कि केवल करेंसी गिरने के भरोसे एक्सपोर्ट बढ़ाना लंबे समय का समाधान नहीं है, इसके लिए इंडस्ट्रियल प्रोडक्टिविटी की जरूरत है।
RBI की मॉनेटरी पॉलिसी और भविष्य
हालिया 25 बेसिस पॉइंट की ब्याज दर बढ़ोतरी को उन्होंने महंगाई को काबू करने और रुपए को बचाने के लिए जरूरी कदम बताया। उनका मानना है कि विदेशी निवेशकों को भारत में बनाए रखने के लिए अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ब्याज दरों का अंतर बनाए रखना जरूरी है।
अंत में, FCNR जैसे स्कीम्स को उन्होंने केवल एक 'अस्थायी बीमा' करार दिया है। वे कहते हैं कि रुपए की मजबूती का इकलौता रास्ता करंट अकाउंट में सुधार, एक्सपोर्ट बेस को मजबूत करना और एनर्जी इंपोर्ट पर निर्भरता कम करना ही है।
