देश की तेजी से बढ़ती **7.8%** की GDP ग्रोथ पर पूर्व RBI गवर्नर D Subbarao ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह विकास जॉब क्रिएशन के बजाय कैपिटल-इंटेंसिव सेक्टर पर ज्यादा आधारित है, जो भविष्य में एक डेमोग्राफिक क्राइसिस पैदा कर सकता है।
पूर्व RBI गवर्नर D Subbarao ने देश की मौजूदा इकोनॉमिक ग्रोथ की संरचना पर गहरी चिंता जताई है। हालांकि भारत की इकोनॉमी 7.8% की रफ्तार से दौड़ रही है, लेकिन सुब्बाराव का कहना है कि यह ग्रोथ युवाओं के लिए पर्याप्त संख्या में स्थिर और उच्च गुणवत्ता वाली नौकरियां पैदा करने में विफल रही है। उनका मुख्य तर्क यह है कि यह विस्तार मुख्य रूप से कैपिटल-इंटेंसिव इंडस्ट्रीज और ऑटोमेशन द्वारा संचालित है, जो विशाल वर्कफोर्स को समाहित नहीं कर पा रही है।
निवेशकों के नजरिए से, यह असंतुलन लॉन्ग-टर्म के लिए रिस्की हो सकता है। कंज्यूमर गुड्स, रिटेल और ऑटोमोबाइल जैसे सेक्टर की सस्टेनेबिलिटी सीधे तौर पर आम लोगों की आय पर निर्भर करती है। यदि ग्रोथ का फायदा लेबर मार्केट तक नहीं पहुंचा, तो भविष्य में घरेलू मांग कम हो सकती है, जिससे कंपनियों के रेवेन्यू पर असर पड़ेगा। सुब्बाराव ने चेताया है कि भारत 'डेमोग्राफिक ट्रैप' की ओर बढ़ सकता है, जहाँ युवा आबादी का लाभ मिलने के बजाय वे कम उत्पादकता वाले काम में उलझे रह जाएंगे।
आगे की राह और सरकारी पहल
इस चुनौती से निपटने के लिए टेक्सटाइल, फुटवियर और फूड प्रोसेसिंग जैसे लेबर-इंटेंसिव सेक्टर में निवेश बढ़ाना अनिवार्य है। सरकार की Production Linked Incentive (PLI) स्कीम भी इसी दिशा में काम कर रही है, ताकि मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिले और छोटे व्यवसायों को बड़े स्तर पर लाया जा सके।
सुब्बाराव ने डेटा की क्वालिटी पर भी जोर दिया है। उन्होंने कहा कि सही फैसलों के लिए हेडलाइन GDP नंबरों को जमीनी हकीकत से जोड़कर देखना जरूरी है। भविष्य में निवेशकों को केवल GDP नंबरों पर ही नहीं, बल्कि एंप्लॉयमेंट डेटा, वेज ग्रोथ ट्रेंड और लेबर-इंटेंसिव सेक्टर की प्रोग्रेस पर भी नजर रखनी होगी।
