Economic Reforms: 9% GDP ग्रोथ के लिए पूर्व CEA सुब्रमण्यम का बड़ा दांव, स्ट्रक्चरल बदलाव पर जोर

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AuthorAditya Rao|Published at:
Economic Reforms: 9% GDP ग्रोथ के लिए पूर्व CEA सुब्रमण्यम का बड़ा दांव, स्ट्रक्चरल बदलाव पर जोर

भारत की ग्रोथ रेट को **7%** के पार ले जाने के लिए पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) Krishnamurthy V. Subramanian ने लैंड, लेबर और कैपिटल मार्केट में बड़े स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स की वकालत की है। निवेशकों के लिए यह संकेत है कि सरकार अब इंफ्रास्ट्रक्चर के बाद प्राइवेट सेक्टर की प्रोडक्टिविटी पर अपना पूरा फोकस शिफ्ट कर सकती है।

भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार और IMF के कार्यकारी निदेशक Krishnamurthy V. Subramanian ने साफ किया है कि 9% की एनुअल GDP ग्रोथ हासिल करने के लिए अब 'सेकंड-जनरेशन रिफॉर्म्स' की जरूरत है। पिछले एक दशक में भारत ने हाईवे और डिजिटल पेमेंट नेटवर्क जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी काम किया है, लेकिन अब फोकस लैंड, लेबर और कैपिटल जैसे फैक्टर मार्केट में बदलाव पर होना चाहिए।

बिजनेस में आसानी का लक्ष्य

फैक्टर मार्केट रिफॉर्म्स का मुख्य उद्देश्य बिजनेस करने की लागत (Cost of Doing Business) को कम करना है। कंपनियों के लिए जमीन अधिग्रहण, लेबर कानून और पूंजी की लागत हमेशा से चुनौती रहे हैं। इन क्षेत्रों को सरल बनाने से प्राइवेट कंपनियां न केवल अपनी दक्षता (Efficiency) बढ़ा सकेंगी, बल्कि ग्लोबल स्तर पर भी मुकाबला करने के लिए बेहतर स्थिति में होंगी।

प्राइवेट इन्वेस्टमेंट का गणित

निवेशकों के लिए सबसे बड़ा पॉइंट यह है कि लॉन्ग-टर्म ग्रोथ प्राइवेट कैपिटल एक्सपेंडिचर पर टिकी है। वर्तमान में प्राइवेट इन्वेस्टमेंट GDP का करीब 22-23% है, जबकि 8% से ऊपर की सस्टेनेबल ग्रोथ के लिए इसे 30% के पार जाना जरूरी है। सरकार का अब तक का निवेश तो मजबूत रहा है, लेकिन अगली चाल प्राइवेट सेक्टर के खर्च पर निर्भर करेगी।

चुनौतियां और रिस्क

Macroeconomic फ्रंट पर कुछ रिस्क अभी भी बने हुए हैं। ग्लोबल अनिश्चितता, जियोपॉलिटिकल तनाव और एनर्जी की कीमतों में उतार-चढ़ाव ट्रेड और फॉरेन इन्वेस्टमेंट को प्रभावित कर रहे हैं। वहीं, देश के भीतर फूड इन्फ्लेशन और मानसून की अनिश्चितता मॉनेटरी पॉलिसी पर असर डालती है। यदि रिफॉर्म्स में देरी होती है, तो प्राइवेट इन्वेस्टमेंट सुस्त रह सकता है, जिससे लंबी अवधि के लक्ष्यों पर असर पड़ सकता है।

आगे क्या देखें?

आने वाली तिमाहियों में निवेशकों को लेबर कोड, लैंड एक्विजिशन और बैंकिंग रिफॉर्म्स से जुड़े सरकारी फैसलों पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। ये बदलाव कॉर्पोरेट प्रोडक्टिविटी और इकोनॉमिक रेजिलिएंस के लिए बड़े पॉजिटिव इंडिकेटर साबित होंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.