इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां लागत घटाने के लिए वियतनाम से पुर्जों का आयात बढ़ा रही हैं। फाइनेंशियल ईयर 2026 में यह आयात बढ़कर **$5.36 बिलियन** पहुंच गया है, जो घरेलू उत्पादन के लक्ष्यों के लिए एक बड़ा रिस्क है।
आयात में तेजी की असली वजह
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां लागत को नियंत्रित करने के लिए वियतनाम पर निर्भरता बढ़ा रही हैं। फाइनेंशियल ईयर 2026 में यहां से $5.36 बिलियन का आयात हुआ, जो पिछले फाइनेंशियल ईयर ($4.89 बिलियन) के मुकाबले 9.5% अधिक है। इस बढ़त का मुख्य कारण ग्लोबल मेमोरी चिप की कीमतों में 5 गुना तक का उछाल है। लागत को कम करने के लिए कंपनियां 'India-ASEAN फ्री ट्रेड एग्रीमेंट' का फायदा उठा रही हैं, जिससे वे जीरो कस्टम ड्यूटी पर सामान मंगवा पा रही हैं।
सरकारी स्कीम बनाम आयात का गणित
सरकार 'मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग' और 'इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग' स्कीम के जरिए स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा दे रही है, लेकिन कंपनियों के लिए आयात अभी भी अधिक किफायती साबित हो रहा है। 4% इंसेंटिव के बावजूद, ट्रेड पैक्ट से मिलने वाली जीरो-ड्यूटी राहत कंपनियों को स्थानीय सप्लाई चेन बनाने से रोक रही है।
रेगुलेटरी चिंता और रिस्क
बाजार में चर्चा है कि वियतनाम का इस्तेमाल चीनी सामान को भारत भेजने के लिए 'कंड्यूट' के रूप में किया जा रहा है। इससे कंपनियां 20% तक के MFN टैरिफ से बच रही हैं। यदि सरकार ने 'Rules of Origin' को सख्त किया या ट्रेड एग्रीमेंट की समीक्षा की, तो इलेक्ट्रॉनिक्स बनाने वाली कंपनियों की रॉ मटेरियल लागत बढ़ सकती है। निवेशकों के लिए मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखना बेहद जरूरी है कि वे कैसे इस इंपोर्ट-निर्भरता को घरेलू क्षमता के साथ संतुलित करते हैं।
