Election Commission of India (ECI) पर बड़ी गाज गिरी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक वोटर लिस्ट से **13 करोड़** नाम बिना उचित प्रक्रिया के हटा दिए गए हैं, जिसने गवर्नेंस और संस्थागत स्थिरता (Institutional Stability) पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल
भारत के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुई इस भारी-भरकम कटौती ने प्रशासनिक ढांचे की पारदर्शिता पर सवाल उठा दिए हैं। डेटा से पता चलता है कि यह पूरी प्रक्रिया 13 करोड़ नागरिकों के नाम हटाने तक सीमित रही, जिससे संस्था की स्वायत्तता (Institutional Autonomy) पर संदेह पैदा हो गया है। निवेशकों के नजरिए से देखें, तो किसी भी देश में संस्थाओं की विश्वसनीयता वहां के 'रिस्क प्रीमियम' का आधार होती है।
अंदरूनी कलह और तकनीकी खामियां
मामले से जुड़ी आंतरिक फाइलों से खुलासा हुआ है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच आयोग के 3 में से 2 सदस्यों ने प्रक्रिया को लेकर कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बावजूद काम जारी रखा गया। विवाद की जड़ में 'ECINet' नामक एक सेंट्रलाइज्ड डेटाबेस सिस्टम है, जिसने फील्ड ऑफिसर्स के सुधार करने के अधिकारों को सीमित कर दिया था। अकेले पश्चिम बंगाल में ही 38 लाख से ज्यादा अपीलें दायर की गई हैं, जो इस गड़बड़ी के व्यापक स्तर को दर्शाती हैं।
बाजार पर असर और आगे की राह
अब यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी हो गया है, जहाँ विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। लॉन्ग-टर्म इकोनॉमिक स्टेबिलिटी के लिए संस्थागत मजबूती अनिवार्य है। बाजार अब इस बात पर नजर रखे हुए है कि क्या सरकार किसी इंडिपेंडेंट ऑडिट या ज्यूडिशियल हस्तक्षेप का रास्ता अपनाती है। निवेशकों के लिए अगली बड़ी ट्रिगर-पॉइंट संसदीय जवाब और कोई भी नया रेगुलेटरी ऑडिट ही होगा।
