Science जर्नल की एक नई स्टडी के मुताबिक, 1850 के बाद से El Niño की तीव्रता में **36%** का उछाल आया है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते 2026 में इसके 'सुपर इवेंट' की आशंका है, जो फूड इन्फ्लेशन और ग्लोबल सप्लाई चेन के लिए बड़ा रिस्क बन सकता है।
क्या कहती है वैज्ञानिकों की रिपोर्ट?
गैलापागोस (Galápagos) के जीवाश्म मूंगों (fossilized corals) के विश्लेषण से चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। रिसर्च में सामने आया है कि पिछले चार दशकों में El Niño की रफ्तार 16% तेज हुई है, जिसे वैज्ञानिक मानव-जनित ग्लोबल वार्मिंग से जोड़कर देख रहे हैं। यह स्थिति 2026 के लिए काफी गंभीर मानी जा रही है, क्योंकि उस समय एक बेहद मजबूत वेदर पैटर्न विकसित होने के संकेत मिल रहे हैं।
भारतीय निवेशकों के लिए चिंता क्या है?
भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए यह सीधा खतरा फूड इन्फ्लेशन का है। El Niño के कारण मानसून की चाल बिगड़ सकती है, जिससे फसल की पैदावार प्रभावित होती है। जब क्रॉप यील्ड गिरती है, तो सप्लाई कम हो जाती है और कीमतें तेजी से ऊपर जाती हैं। इसका सीधा असर भारतीय FMCG कंपनियों और फूड सेक्टर के मार्जिन पर पड़ता है, जिस पर Reserve Bank of India (RBI) की पैनी नजर बनी रहती है।
कमोडिटी और ग्लोबल मार्केट पर असर
यह खतरा सिर्फ खाने-पीने की चीजों तक सीमित नहीं है। सूखे और बाढ़ जैसी चरम स्थितियों के कारण साउथ अमेरिका जैसे क्षेत्रों में माइनिंग और मेटल ऑपरेशंस ठप हो सकते हैं। सप्लाई चेन में आने वाली इन दिक्कतों से कच्चा माल महंगा होगा, जिससे ग्लोबल इंडस्ट्रीज का प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ना तय है।
मार्केट के लिए 'वॉच-लिस्ट' में क्या रखें?
आने वाले समय में कंपनियों के क्वार्टरली रिजल्ट्स में मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखें। विशेष रूप से यह देखना जरूरी होगा कि कंपनियां बढ़ती इनपुट कॉस्ट और सप्लाई चेन में आने वाले व्यवधानों को कैसे हैंडल कर रही हैं। साथ ही, ग्लोबल इन्फ्लेशन डेटा और सरकारी नीतियों के जरिए यह ट्रैक करना होगा कि वेदर-ड्रिवेन महंगाई इकोनॉमी को किस हद तक प्रभावित कर रही है।
