अर्थशास्त्री Surjit Bhalla की एक हालिया स्टडी ने चुनावी डेटा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल **13.37 करोड़** वोटर डिलीशन में से करीब **70 लाख** ऐसे नाम हैं जिनका हटना तर्कहीन लगता है।
अर्थशास्त्री Surjit Bhalla ने भारत की 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' प्रक्रिया के दौरान हटाए गए 13.37 करोड़ नामों का गहरा विश्लेषण किया है। हालांकि इनमें से ज्यादातर नाम प्रशासनिक सुधारों जैसे मृत व्यक्तियों या प्रवासियों के रिकॉर्ड अपडेट करने के लिए हटाए गए थे, लेकिन करीब 70 लाख नाम ऐसे हैं जिनका कोई स्पष्ट प्रशासनिक आधार समझ नहीं आता।
13 करोड़ का आंकड़ा और चुनावी गणित
Bhalla ने 100.8 करोड़ की वयस्क आबादी और 8.5% के गैर-पंजीकरण दर को आधार मानकर एक बेंचमार्क सेट किया है, जिसके मुताबिक रजिस्टर्ड वोटरों की संख्या 92.2 करोड़ होनी चाहिए। इस एनालिसिस के अनुसार, ये संदिग्ध डिलीशन कुल वयस्क आबादी के 1% से भी कम हैं, जो बड़े पैमाने पर धांधली के दावों को चुनौती देते हैं।
क्षेत्रीय असमानताएं (Regional Outliers)
रिपोर्ट बताती है कि चुनावी संशोधन प्रक्रिया पूरे देश में एक समान नहीं थी। पश्चिम बंगाल इसका सबसे बड़ा अपवाद है, जहां 40 लाख से 60 लाख के बीच ऐसे वोटर हटाए गए जिनका कोई ठोस कारण नहीं था। इसके विपरीत, बिहार में नामों की अधिकता देखी गई, जिसे प्रवासियों के अपने गृह राज्यों में नाम बने रहने से जोड़ा गया है।
प्रशासनिक चुनौतियां और अपील का धीमापन
साल 2026 की शुरुआत में ज्यूडिशियल ऑफिसर्स की निगरानी में 27 लाख नाम हटाए गए थे, जिनमें मुस्लिम वोटरों का अनुपात अधिक था। हालांकि Election Commission of India (ECI) का कहना है कि 93% अपीलों के बाद नाम बहाल किए गए, लेकिन अब तक केवल 1.3 लाख मामलों का निपटारा ही एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती बना हुआ है। अब पूरी बहस चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और तेजी पर आकर टिक गई है।
