पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में बुनियादी ढांचे की कमी और प्रशासनिक अड़चनों के कारण आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी है। पोर्ट बॉटलनेक्स और अटकी हुई ट्रांसपोर्ट परियोजनाओं के चलते लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ रही है और व्यापार पर असर पड़ रहा है।
पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर राज्यों के पास दक्षिण-पूर्वी एशिया से जुड़ने का बड़ा मौका है, लेकिन प्रशासनिक विखंडन और इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियां उनके आर्थिक विकास में रोड़ा बनी हुई हैं। आंकड़ों की बात करें तो नेशनल आउटपुट में पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी महज 5.6% है, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों का कुल योगदान 3% से भी कम है, जो आर्थिक पिछड़ेपन को दर्शाता है।
प्लानिंग में कमी और प्रशासनिक उलझन
क्षेत्रीय विकास के लिए बनी सरकारी योजनाएं जैसे Purvodaya, UNNATI और PM-DevINE अक्सर अलग-अलग प्रशासनिक डेस्क के जरिए काम करती हैं। निवेशकों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि उन्हें कई स्तरों पर ब्यूरोक्रेसी से निपटना पड़ता है। सेंट्रलाइज्ड प्लानिंग न होने की वजह से यह पूरा क्षेत्र एक संगठित मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभर नहीं पा रहा है।
पोर्ट और लॉजिस्टिक्स की मार
Haldia और Calcutta पोर्ट्स पर गहराई की समस्या के कारण बड़े जहाज यहां नहीं आ पाते, जिससे निर्यातकों को सामान Singapore या Colombo जैसे केंद्रों से घुमाकर भेजना पड़ता है। इससे न केवल समय ज्यादा लगता है, बल्कि लॉजिस्टिक्स लागत भी बढ़ जाती है, जिसका सीधा असर मुनाफे (Profit Margin) पर पड़ता है।
कनेक्टिविटी का संकट
Kaladan Multi-Modal Transit Transport Project जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं देरी की शिकार हैं और Siliguri Corridor में माल की आवाजाही आज भी एक बड़ी अड़चन बनी हुई है। हालांकि Japan जैसे देशों से विदेशी निवेश की रुचि दिखाई दे रही है, लेकिन एक एकीकृत डोमेस्टिक फ्रेमवर्क की कमी के कारण कंपनियां यहां अपने कामकाज को बड़े स्तर पर नहीं फैला पा रही हैं।
जानकारों का मानना है कि यदि 'East Investment Platform' जैसा कोई एकीकृत सिस्टम बनाया जाए, तो राज्यों के बीच समन्वय बेहतर होगा और निवेशकों के लिए एक सिंगल विंडो सुविधा तैयार हो सकेगी। बिना इस एकीकरण के, इस क्षेत्र की मैन्युफैक्चरिंग और कृषि क्षमता का पूरा लाभ उठाना मुश्किल होगा।
