यूरोपीय संघ (EU) ने मई 2027 तक भारत को मेटल स्क्रैप का निर्यात रोकने का प्रस्ताव दिया है। पर्यावरण संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए लिए गए इस फैसले से भारत की **25%** स्क्रैप सप्लाई पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, जिससे मैन्युफैक्चरर्स की लागत बढ़ सकती है।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर खतरा
यूरोपीय आयोग के इस नए प्रस्ताव ने भारतीय मेटल रिसाइकिलर्स और मैन्युफैक्चरर्स की चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत के सेकेंडरी मेटल मैन्युफैक्चरर्स अपनी भट्टियां चलाने के लिए बड़े पैमाने पर आयातित स्क्रैप पर निर्भर हैं। अगर यह सप्लाई बंद होती है, तो कंपनियों को मजबूरी में महंगे 'वर्जिन मेटल' का उपयोग करना पड़ेगा, जिससे ऑपरेटिंग मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा।
निर्भरता के आंकड़े
भारत की स्क्रैप जरूरतों का लगभग 25% हिस्सा EU से आता है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एल्युमीनियम, कॉपर और जिंक जैसे धातुओं के मामले में यह निर्भरता 40% तक है। छोटे और मध्यम दर्जे की कंपनियों (MSMEs) के लिए यह स्थिति सबसे चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि उनके पास कच्चे माल की कीमतों में अचानक उछाल को झेलने के लिए पर्याप्त कैपिटल नहीं है।
इंडस्ट्री और सरकार का रुख
'मटेरियल रिसाइकिलिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया' ने इसे पर्यावरण के नाम पर 'रिसोर्स प्रोटेक्शनिज्म' (संसाधन संरक्षण) करार दिया है। एसोसिएशन ने 'वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय' से इस मामले में कूटनीतिक बातचीत करने की मांग की है। सरकार ने पुष्टि की है कि वे यूरोपीय समकक्षों के साथ बातचीत कर रहे हैं। निवेशकों की नजर अब भारत और EU के बीच चल रही ट्रेड नेगोशिएशन्स पर होनी चाहिए, क्योंकि यही वह मंच है जहाँ 2027 की डेडलाइन से पहले राहत की उम्मीद की जा सकती है।
