यूरोपीय कोर्ट ऑफ ऑडिटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, **1.4 बिलियन यूरो** की साइबर सुरक्षा रणनीति डेटा शेयरिंग के अभाव में फेल हो रही है। इस विवाद का सीधा असर यूरोपीय क्लाइंट्स के साथ काम कर रही भारतीय आईटी कंपनियों के मार्जिन पर पड़ सकता है।
यूरोपीय संघ (EU) ने साइबर हमलों से निपटने के लिए 1.4 बिलियन यूरो का भारी-भरकम निवेश किया था, लेकिन यह योजना जमीन पर दम तोड़ती नजर आ रही है। ताजा ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि सदस्य देश सुरक्षा कारणों का हवाला देकर एक-दूसरे के साथ क्रिटिकल डेटा शेयर नहीं कर रहे हैं, जिससे पूरा यूरोप डिजिटल खतरों के प्रति असुरक्षित बना हुआ है।
चार देशों पर कानूनी तलवार
यूरोपीय कमीशन ने अब सख्ती बढ़ा दी है। जुलाई में फ्रांस, आयरलैंड, नीदरलैंड और स्पेन के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करते हुए उन्हें EU कोर्ट ऑफ जस्टिस में घसीटा गया है। इन देशों पर आरोप है कि उन्होंने साइबर सुरक्षा से जुड़े अनिवार्य नियमों को अपने घरेलू कानूनों में लागू ही नहीं किया। साल 2016 से अब तक इन देशों ने साइबर घटनाओं की सही जानकारी अधिकारियों को नहीं दी है।
भारतीय आईटी सेक्टर के लिए खतरे की घंटी
भारतीय शेयर बाजार के लिहाज से यह खबर चिंताजनक हो सकती है क्योंकि देश की बड़ी आईटी कंपनियां यूरोप के बैंकिंग और एविएशन सेक्टर में बड़े पैमाने पर काम करती हैं। अगर EU इन लूपहोल्स को बंद करने के लिए सख्त और पेचीदा रिपोर्टिंग नियम लाता है, तो भारतीय कंपनियों का कंप्लायंस खर्च (Compliance Cost) काफी बढ़ सकता है।
इसके अलावा, सितंबर 2025 में हुई रैनसमवेयर जैसी घटनाएं, जिन्होंने लंदन, ब्रुसेल्स और डबलिन के एविएशन ऑपरेशन्स को ठप कर दिया था, भविष्य में प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन बिगाड़ सकती हैं। यदि क्लाइंट्स को अपने सुरक्षा सिस्टम को रातों-रात अपडेट करना पड़ा, तो आईटी कंपनियों के इंजीनियरों का समय नए ग्रोथ प्रोजेक्ट्स की जगह सिर्फ इन सुरक्षा मानकों को पूरा करने में निकल जाएगा, जिससे उनके मुनाफे (Profit Margins) पर सीधा दबाव आ सकता है।
