EU Carbon Rules: भारतीय स्टील एक्सपोर्ट पर मंडराया संकट, बढ़ रही है Compliance Cost

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorAditi Chauhan|Published at:
EU Carbon Rules: भारतीय स्टील एक्सपोर्ट पर मंडराया संकट, बढ़ रही है Compliance Cost

यूरोपीय संघ (EU) के नए Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) ने भारतीय स्टील कंपनियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सख्त एमिशन रिपोर्टिंग और बढ़ते कार्बन नियमों के चलते एक्सपोर्टर्स के मार्जिन पर भारी दबाव है और उन्हें ग्रीन एनर्जी की ओर तेजी से शिफ्ट होना पड़ रहा है।

मुनाफे पर सीधा प्रहार

जनवरी 2026 से लागू हुए इन नियमों ने अब केवल कागजी कार्रवाई को खत्म कर सीधे वित्तीय प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। भारतीय स्टील कंपनियों को अब अपने प्रॉडक्ट्स का कार्बन फुटप्रिंट बताना अनिवार्य हो गया है। समस्या यह है कि भारत में स्टील का प्रोडक्शन मुख्य रूप से कोल-बेस्ड ब्लास्ट फर्नेस तकनीक से होता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन 2.0 से 2.5 टन प्रति टन स्टील तक पहुंच जाता है, जबकि यूरोप का औसत सिर्फ 1.4 से 1.8 टन है।

कंपनियों के पास क्या विकल्प हैं?

EU ने नियम बनाया है कि या तो कंपनियां अपना सटीक डेटा वेरिफाई कराएं, या फिर उन्हें 'डिफ़ॉल्ट' उत्सर्जन वैल्यू के आधार पर भारी पेनल्टी भरनी होगी। इसके लिए थर्ड-पार्टी वेरिफिकेशन और एडमिनिस्ट्रेटिव सिस्टम पर मोटा खर्च करना पड़ रहा है, जो खास तौर पर MSMEs के लिए बहुत महंगा साबित हो रहा है।

निर्यात में बड़ी गिरावट

बड़े खिलाड़ियों जैसे JSW Steel और Tata Steel ने तो इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस और रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश बढ़ा दिया है, लेकिन पूरी इंडस्ट्री पर इसका असर साफ है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारतीय स्टील का EU को होने वाला एक्सपोर्ट 35.1% तक गिर गया है, क्योंकि विदेशी खरीदार अब कार्बन-इंटेंसिव स्टील से दूरी बना रहे हैं।

निवेशकों के लिए क्या है जरूरी?

सरकार अब Carbon Credit Trading Scheme (CCTS) के जरिए इन लागतों को कम करने की कोशिश कर रही है। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि कौन सी कंपनियां अपनी प्रोडक्शन तकनीक को तेजी से बदल रही हैं और किनके पास एक्सपोर्ट मार्जिन को संभालने की क्षमता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.