Employees Provident Fund Organisation (EPFO) अपने सालाना फंड का **3%** हिस्सा अब Alternative Investment Funds (AIFs) में लगाने की तैयारी कर रहा है। इस कदम का मकसद पोर्टफोलियो को डाइवर्सिफाई करना और लॉन्ग-टर्म रिटर्न को बेहतर बनाना है।
बड़ा बदलाव: निवेश की नई दिशा
भारत का सबसे बड़ा रिटायरमेंट फंड अब एक बड़े रणनीतिक बदलाव की ओर बढ़ रहा है। अब तक EPFO का मुख्य फोकस सरकारी बॉन्ड्स जैसे सुरक्षित निवेश पर रहा है, जो इसके 30 करोड़ सदस्यों की पूंजी को सुरक्षित रखते आए हैं। लेकिन अब, बोर्ड ने सालाना इनफ्लो का 3% हिस्सा कैटेगरी I और II के Alternative Investment Funds (AIFs) में निवेश करने का प्रस्ताव तैयार किया है।
सुरक्षा के कड़े मानक
निवेश सीधे नहीं किया जाएगा, बल्कि इसके लिए National Investment and Infrastructure Fund (NIIF) और SIDBI के 'Startup India Fund of Funds' जैसे विश्वसनीय माध्यमों का इस्तेमाल होगा। जोखिम को नियंत्रित रखने के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं:
- केवल उन्हीं AIFs में निवेश होगा जिनका कॉर्पस कम से कम ₹100 करोड़ हो।
- विदेशी निवेश पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।
- रिस्क को कम करने के लिए फंड एक्सपोजर पर सख्त कैप (Limit) लगाई जाएगी।
क्यों है यह जरूरी?
पारंपरिक सरकारी बॉन्ड्स के मुकाबले स्टार्टअप्स और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में ग्रोथ की अपार संभावनाएं हैं। हालांकि, इसमें लिक्विडिटी की कमी और बाजार की अस्थिरता का जोखिम भी होता है, जिसे देखते हुए मैनेजमेंट ने सुरक्षा प्रोटोकॉल को सबसे ऊपर रखा है।
अगली बड़ी अपडेट
इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय नवंबर में होने वाली सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की बैठक में लिया जाएगा। इस बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया करेंगे। अगर यह प्रस्ताव पास होता है, तो EPFO के ₹30 लाख करोड़ के विशाल पोर्टफोलियो के प्रबंधन का एक नया अध्याय शुरू होगा, जिसका सीधा असर करोड़ों नौकरीपेशा लोगों के रिटायरमेंट फंड की ग्रोथ पर पड़ेगा।
