Union Cabinet ने EPF वेज सीलिंग को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 कर दिया है। यह बदलाव 16 सितंबर 2026 से लागू होगा। इससे जहां सोशल सिक्योरिटी का दायरा बढ़ा है, वहीं कंपनियों के लिए लेबर कॉस्ट में बढ़ोतरी होना तय है।
कंपनियों के लिए क्या हैं चुनौतियां?
सरकार के इस नए फैसले के साथ ही कंपनियों के लिए अब स्टाफ पर आने वाला खर्च सीधा बढ़ गया है। कंपनियों को अब बढ़ी हुई लिमिट के हिसाब से Employee Deposit Linked Insurance (EDLI) और EPF अकाउंट में ज्यादा कॉन्ट्रिब्यूशन करना होगा। EDLI के लिए अनिवार्य योगदान अब प्रति कर्मचारी ₹75 से बढ़कर ₹125 प्रति माह हो जाएगा। यह राशि भले ही छोटी लगे, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग, रिटेल, लॉजिस्टिक्स और टेक्सटाइल जैसे सेक्टर, जहां वर्कफोर्स की संख्या हजारों में है, वहां यह कुल एक्सपेंस को काफी बढ़ा देगा।
मार्जिन पर दबाव का डर
इन्वेस्टर्स के लिए यह ध्यान देना जरूरी है कि जो कंपनियां कम मार्जिन पर काम करती हैं और लेबर पर ज्यादा निर्भर हैं, उनके ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव आ सकता है। जब रेवेन्यू का एक बड़ा हिस्सा ह्यूमन रिसोर्स पर खर्च होता है, तो ऐसे छोटे बदलाव भी तिमाही नतीजों (Quarterly Results) पर असर डाल सकते हैं।
कर्मचारियों की जेब पर असर
जो कर्मचारी ₹15,000 से ₹25,000 की सैलरी रेंज में आते हैं, उनकी टेक-होम सैलरी में कमी आएगी क्योंकि अब उनका ज्यादा पैसा पीएफ में कटेगा। हालांकि, यह उनके रिटायरमेंट के लिए बेहतर है, लेकिन इससे शॉर्ट टर्म में कंज्यूमर स्पेंडिंग पर हल्का असर पड़ सकता है।
EDLI बेनेफिट्स में कोई बदलाव नहीं
खास बात यह है कि बढ़ी हुई राशि के बावजूद EDLI स्कीम के तहत मिलने वाला बीमा कवर ₹7 लाख पर ही सीमित रहेगा। यानी कर्मचारियों को अतिरिक्त कवरेज का लाभ नहीं मिल रहा है। आने वाले समय में अब देखना यह होगा कि कंपनियां इस बढ़े हुए खर्च को खुद झेलती हैं या अपनी ऑपरेशनल एफिशिएंसी में बदलाव कर मुनाफे को बचाए रखती हैं।
