EEPC India ने BRICS देशों के साथ व्यापार को आसान बनाने के लिए बड़ा प्रस्ताव रखा है। परिषद ने नॉन-टैरिफ बैरियर्स हटाने और लोकल करेंसी में पेमेंट की वकालत की है, जिससे इंजीनियरिंग सेक्टर को फायदा होगा जो भारत के कुल मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में **27%** की हिस्सेदारी रखता है।
व्यापार में बड़ी बाधाओं को हटाने की कवायद
Engineering Exports Promotion Council (EEPC) ने मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के साथ मिलकर BRICS ब्लॉक में ट्रेड पॉलिसी में बदलाव की मांग की है। सितंबर 2026 में हुई 18वीं BRICS समिट के दौरान, परिषद ने जोर देकर कहा कि अगर सदस्य देश नॉन-टैरिफ बैरियर्स को हटा दें और लोकल करेंसी में पेमेंट की सुविधा दें, तो व्यापार में आ रही बड़ी अड़चनें दूर हो जाएंगी।
एक्सपोर्टर्स को होगा कितना फायदा?
भारत के लिए इंजीनियरिंग गुड्स का एक्सपोर्ट काफी अहम है, जो कुल मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट का लगभग 27% है। फिलहाल चीन, ब्राजील, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में अलग-अलग टेक्निकल स्टैंडर्ड्स के कारण भारतीय कंपनियों को काफी मुश्किल होती है। EEPC इंडिया के चेयरमैन पंकज चड्ढा का मानना है कि यदि रेगुलेटरी स्टैंडर्ड्स को एक समान कर दिया जाए और पेमेंट सिस्टम को आसान बनाया जाए, तो एक्सपोर्टर्स की 75% तक ऑपरेशनल दिक्कतें खत्म हो सकती हैं।
ट्रांजैक्शन कॉस्ट घटाने पर जोर
नया प्रस्ताव विशेष रूप से छोटी कंपनियों (MSMEs) के लिए तैयार किया गया है, जो उभरते बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाना चाहती हैं। लोकल करेंसी सेटलमेंट से न केवल ट्रांजैक्शन कॉस्ट कम होगी, बल्कि ग्लोबल करेंसी पर निर्भरता घटने से करेंसी एक्सचेंज रेट के उतार-चढ़ाव (Volatility) का रिस्क भी काफी कम हो जाएगा।
चुनौतियां और भविष्य की राह
हालांकि यह प्रस्ताव काफी सकारात्मक है, लेकिन भारत को BRICS देशों के साथ अपने ट्रेड डेफिसिट और वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताओं से भी निपटना होगा, जो सप्लाई चेन को प्रभावित कर रही हैं। अब देखना यह है कि ये पॉलिसी चर्चाएं कब तक ठोस समझौतों में बदलती हैं और सदस्य देश इन बदलावों को लागू करने के लिए कितने तैयार हैं।
