भारतीय शेयर बाजार में देसी निवेशकों (DIIs) का दबदबा लगातार बढ़ रहा है। जून 2026 तक, Nifty 500 कंपनियों में इनकी हिस्सेदारी रिकॉर्ड **21%** पर पहुंच गई है। यह लगातार नौवीं तिमाही की बढ़त है, जिसने विदेशी निवेशकों (FIIs) की बिकवाली को काफी हद तक बेअसर कर दिया है।
देसी पूंजी का बढ़ता कमाल
भारतीय शेयर बाजार की स्थिरता के लिए अब देसी पैसा मुख्य इंजन बनता जा रहा है। जून 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ने Nifty 500 कंपनियों में अपनी सामूहिक हिस्सेदारी को सर्वकालिक उच्च स्तर 21% तक पहुंचा दिया है। यह बड़ा मुकाम लगातार नौ तिमाहियों की नेट बाइंग के बाद आया है, जो भारतीय शेयरों में निवेश के बदलते परिदृश्य का संकेत देता है।
विदेशी निवेशकों की वापसी और देसी सहारा
जहां एक ओर देसी निवेशक बाजार में पैसा लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की भागीदारी में लगातार कमी देखी जा रही है। Nifty 500 में विदेशी हिस्सेदारी घटकर 17% रह गई है, जो जून 2025 में 18.9% थी। विदेशी निवेशकों के निकलने के पीछे वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, भारतीय बाजार के वैल्यूएशन को लेकर चिंताएं और कॉर्पोरेट मुनाफे की रफ्तार में नरमी जैसे कई कारण हैं। सितंबर 2024 से अब तक, विदेशी निवेशकों ने कुल $58 अरब की बिकवाली की है।
बाजार की मजबूती का राज
विदेशी बिकवाली के बावजूद, भारतीय शेयर बाजार मजबूत बना हुआ है, जिसका मुख्य श्रेय देसी स्रोतों से आने वाली भारी पूंजी को जाता है। पिछले 22 महीनों में, DIIs ने बाजार में लगभग $166 अरब का निवेश किया है। इस देसी खरीदारी की ताकत को रिटेल निवेशकों की लगातार रुचि का भी समर्थन मिल रहा है, जिनमें सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIPs) के जरिए मासिक योगदान औसतन $3 अरब रहा है। इस निरंतर इनफ्लो ने विदेशी बिकवाली के दौर में बाजार में बड़ी गिरावट को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सेक्टर और मार्केट कैप के लिहाज से बदलाव
Nifty 500 के 24 प्रमुख सेक्टरों में से 19 में देसी स्वामित्व का यह बदलाव व्यापक है। वर्तमान में, DIIs की सबसे बड़ी हिस्सेदारी प्राइवेट बैंकों में 38.5% है, इसके बाद कंज्यूमर गुड्स में 23.8%, टेलीकम्युनिकेशन में 23.2%, ऑयल एंड गैस में 22% और टेक्नोलॉजी सेक्टर में 21.8% है। विदेशी निवेशकों ने अपनी पोजीशन कम की है, लेकिन वे अभी भी प्राइवेट बैंकिंग और टेलीकम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रभाव रखते हैं।
मार्केट कैपिटलाइजेशन के नजरिए से देखें तो, DIIs ने लार्ज-कैप शेयरों में 22.3%, मिड-कैप शेयरों में 19.1% और स्मॉल-कैप शेयरों में 17.2% की रिकॉर्ड स्वामित्व स्तर हासिल किया है। इसके विपरीत, विदेशी निवेशकों ने इन सभी श्रेणियों में अपने निवेश को कम किया है।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
निवेशकों के लिए मुख्य बात यह होगी कि देसी इनफ्लो की स्थिरता बनी रहती है या नहीं। वर्तमान रुझान वैश्विक अस्थिरता के खिलाफ एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है, लेकिन SIP योगदान की गति में कोई भी बदलाव या घरेलू ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव इस समर्थन की तीव्रता को प्रभावित कर सकता है। निवेशकों को भविष्य के तिमाही शेयरधारिता अपडेट पर नजर रखनी चाहिए कि क्या DIIs अपनी एक्सपोजर बढ़ाना जारी रखते हैं या वैल्यूएशन में उतार-चढ़ाव के साथ खरीदारी की गति स्थिर होती है।
