2024 में शुरू हुए 'Digital Agriculture Mission' पर अब सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी लाभों को सीधे जमीन के मालिकाना हक से जोड़ना महिला किसानों और बटाईदारों को सिस्टम से बाहर कर सकता है।
2024 में लॉन्च किया गया 'Digital Agriculture Mission' का उद्देश्य भारतीय खेती को आधुनिक बनाना है, लेकिन फिलहाल यह अपनी नीतियों के कारण जांच के दायरे में है। मुख्य विवाद इस बात पर है कि सरकार ने किसानों को मिलने वाले लाभों को औपचारिक जमीन रिकॉर्ड से जोड़ दिया है। विशेषज्ञों का डर है कि इससे वे लोग पीछे छूट जाएंगे जो वास्तव में खेती तो करते हैं, लेकिन जिनके नाम जमीन के कागजात नहीं हैं।
समावेशी पहुंच (Inclusive Access) का संकट
भारत के कृषि कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी लगभग 42% है, लेकिन ग्रामीण भूमि स्वामित्व में उनकी हिस्सेदारी केवल 17% ही है। अगर डिजिटल सेवाओं, सब्सिडी और क्रेडिट का लाभ लेने के लिए सिर्फ जमीन का मालिक होना अनिवार्य होगा, तो एक बड़ा वर्ग इन सुविधाओं से वंचित रह जाएगा। इससे मिशन का ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदलने का लक्ष्य अधूरा रह सकता है।
डिजिटल साक्षरता और बुनियादी ढांचे की कमी
मिशन की राह में तकनीकी बाधाएं भी बड़ी हैं। 2025 के NSSO डेटा के अनुसार, ग्रामीण भारत के केवल 50% वयस्कों के पास स्मार्टफोन और स्टेबल इंटरनेट कनेक्शन है। महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा और भी खराब है, जहां सिर्फ एक-तिहाई के पास ही यह सुविधा है। साथ ही, लगभग आधी ग्रामीण आबादी आज भी डिजिटल टूल्स का सही उपयोग करने में सक्षम नहीं है।
लेबर मार्केट पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बिना किसी रिस्क मैनेजमेंट या री-स्किलिंग प्लान के कृषि में ऑटोमेशन लाया जाता है, तो इससे खेतिहर मजदूरों के सामने बेरोजगारी का संकट खड़ा हो सकता है। विशेष रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उन लोगों पर बुरा असर पड़ सकता है जो पूरी तरह से मजदूरी पर निर्भर हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार इन पॉलिसी में सुधार करती है या नहीं।
