भारत के टेक सेक्टर में हायरिंग का पैटर्न पूरी तरह बदल रहा है। Agentic AI प्रोफेशनल्स की मांग इस साल **260%** बढ़ गई है। कंपनियां अब पायलट प्रोजेक्ट्स से आगे बढ़कर फुल-स्केल AI अपनाने की तैयारी में हैं, जिससे IT सेक्टर के मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
हायरिंग का बदलता दौर
भारत के टेक्नोलॉजी सेक्टर में रिक्रूटमेंट की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। CIEL HR के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, Agentic AI इंजीनियर्स—जो स्वायत्त (Autonomous) AI सिस्टम बनाने और मैनेज करने में माहिर हैं—की डिमांड में साल-दर-साल 260% का उछाल आया है। कंपनियां अब AI का उपयोग केवल प्रयोग के तौर पर नहीं, बल्कि सीधे बिजनेस वर्कफ्लो में करने के लिए मैनपावर जुटा रही हैं।
स्किल गैप और मुनाफे पर दबाव
हायरिंग की इस दौड़ में कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती 'स्किल गैप' है। साइबर सिक्योरिटी, क्लाउड कंप्यूटिंग और मशीन लर्निंग जैसे क्षेत्रों में 38% से लेकर 61% तक की कमी देखने को मिल रही है। निवेशकों के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार जैसी है। मार्जिन बचाने के लिए कंपनियों को या तो महंगे टैलेंट को हायर करना होगा या फिर अपनी इंटरनल ट्रेनिंग एकेडमी पर मोटा खर्च करना होगा। यह ट्रेनिंग लागत短期 रूप से ऑपरेटिंग मार्जिन (Operating Margins) पर दबाव डाल सकती है।
क्या खत्म हो जाएगा पुराना बिलिंग मॉडल?
Agentic AI की दस्तक से IT कंपनियों के कमाई के तरीके पर भी असर पड़ रहा है। डेटा के मुताबिक, AI अब टिकट रिजॉल्यूशन और रिपोर्ट जनरेशन जैसे कार्यों का 70% हिस्सा खुद संभाल सकता है, जबकि टेस्ट केस क्रिएशन में 65% काम AI कर रहा है। इसका सीधा मतलब है कि घंटों के आधार पर बिलिंग (Hours-based billing) का पुराना मॉडल अब पुराने पड़ रहे हैं। जो कंपनियां इन रूटीन कामों को ऑटोमेट नहीं कर पाएंगी, वे उन कंपनियों से पिछड़ सकती हैं जो AI के जरिए बेहतर दक्षता दे रही हैं।
आगे की राह
अन्य विशेषज्ञ भूमिकाओं जैसे 'GenAI सॉल्यूशंस आर्किटेक्ट्स' और 'AI प्रोडक्ट ओनर्स' की मांग में 120% की वृद्धि हुई है, जबकि MLOps और LLM इंजीनियरिंग में 80% से ज्यादा का उछाल देखा गया है। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन और मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि AI से होने वाली प्रोडक्टिविटी का फायदा, ट्रेनिंग पर होने वाले भारी खर्च को कवर कर पा रहा है या नहीं।
