दिल्ली सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए हेल्थ बजट को **69%** बढ़ाकर लगभग **₹12,900 करोड़** कर दिया है, लेकिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर के अंत तक आधे से कम फंड ही खर्च हो पाया है। इस धीमी रफ्तार ने स्वास्थ्य सुधारों की डिलीवरी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बजट तो बढ़ा, पर काम कहां है?
दिल्ली सरकार ने 2025-26 के लिए हेल्थकेयर सेक्टर को लेकर बड़े वादे किए थे। बजट में 69% की भारी बढ़ोतरी के साथ इसे ₹12,893 करोड़ कर दिया गया। लेकिन, लेजिस्लेटिव असेंबली की 'कमेटी ऑन पब्लिक अकाउंट्स' की रिपोर्ट में जो तस्वीर सामने आई है, वह चिंताजनक है। दिसंबर 2025 के अंत तक, फाइनेंशियल ईयर के अधिकांश महीने बीत जाने के बावजूद, सरकार आवंटित बजट का आधा हिस्सा भी खर्च नहीं कर पाई है।
क्यों है ये चिंता की बात?
प्रशासन में देरी का सबसे बड़ा रिस्क 'एंड-ऑफ-ईयर रश' (End-of-year rush) होता है। जब साल के अंत में विभाग बजट खत्म करने के लिए आनन-फानन में पैसा खर्च करते हैं, तो प्रोजेक्ट्स की क्वालिटी और देखरेख पर बुरा असर पड़ता है। इसका सीधा मतलब यह है कि सिर्फ बजट बढ़ा देने से जनता को बेहतर हेल्थ सर्विसेज नहीं मिलेंगी, जब तक कि साल भर फंड का सही तरीके से इस्तेमाल न हो।
नेशनल पॉलिसी से कितनी दूर?
मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली का हेल्थ खर्च इसके GSDP का महज 0.68% से 0.79% ही है। नेशनल हेल्थ पॉलिसी 2017 का लक्ष्य इसे 2.5% तक ले जाने का है। सरकार का दावा है कि 2030 तक इसे हासिल कर लिया जाएगा, लेकिन लेजिस्लेटिव पैनल ने इस पर संदेह जताया है क्योंकि उनके पास कोई स्पष्ट रोडमैप या प्रोजेक्ट-विशिष्ट डेटा नहीं है।
जवाबदेही (Accountability) का संकट
अस्पताल-स्तर पर परफॉरमेंस मैट्रिक्स, दवाओं की खरीद का समय और एग्जीक्यूशन रोडमैप जैसी जानकारियों की कमी ने इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। बिना स्पष्ट माइलस्टोन के, सरकार के हेल्थकेयर विस्तार के दावों पर भरोसा करना मुश्किल हो रहा है। आने वाले समय में ऑडिट रिपोर्ट्स और बजट खर्च की रफ्तार ही यह तय करेगी कि क्या यह बजट आम आदमी के काम आएगा या सिर्फ कागजों पर ही सिमटा रहेगा।
