DP World Group के CEO युवराज नारायण का कहना है कि अब 'जस्ट-इन-टाइम' सप्लाई चेन का युग बीत चुका है। जियोपॉलिटिकल अस्थिरता और बढ़ती ब्याज दरों के कारण कंपनियों को अब ज्यादा इन्वेंट्री रखनी होगी, जिससे उनके मुनाफे पर दबाव बढ़ेगा।
सप्लाई चेन का बदलता चेहरा
लंबे समय से कंपनियां 'जस्ट-इन-टाइम' लॉजिस्टिक्स मॉडल पर काम कर रही थीं, ताकि कम से कम इन्वेंट्री रखकर लागत बचाई जा सके। लेकिन अब यह मॉडल पूरी तरह बदल गया है। युवराज नारायण के अनुसार, दुनिया अब 'एफिशिएंसी' से ज्यादा 'ऑपरेशनल सर्वाइवल' पर ध्यान दे रही है। जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण व्यापारिक रास्तों में अनिश्चितता बढ़ गई है, जिससे कंपनियों को सप्लाई लाइन्स को सुरक्षित करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
क्यों बढ़ रही है कंपनियों की लागत?
इन्वेंट्री की नई रणनीति के तहत कंपनियों को पहले के मुकाबले 40% ज्यादा स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स क्षमता की जरूरत है। यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब ब्याज दरें ऊंचे स्तर पर हैं और कैपिटल कॉस्ट 8% के आसपास बनी हुई है।
निवेशकों के लिए इसका मतलब साफ है—कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ेगा। अगर कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत को खुद नहीं झेलती हैं और ग्राहकों पर डालती हैं, तो उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी तय है। जो कंपनियां सिंगल-सोर्स सप्लाई चेन पर निर्भर हैं, उन्हें अब भारी जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।
भारत के लिए मौका
इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत के लिए बड़ा अवसर है। दुनिया भर की कंपनियां अब अपनी निर्भरता घटाने के लिए नए मैन्युफैक्चरिंग हब तलाश रही हैं। हालांकि, भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को कितनी तेजी से विकसित करते हैं।
निवेशकों को अब कंपनियों के 'केपेक्स' (Capex) और वर्किंग कैपिटल पर नजर रखने की जरूरत है। बड़ी इन्वेंट्री का मतलब है ज्यादा पूंजी का फँसना, जिसका सीधा असर 'फ्री कैश फ्लो' पर पड़ सकता है। आने वाले समय में वही कंपनियां जीतेंगी जो इन्वेंट्री मैनेजमेंट और मार्जिन बनाए रखने के बीच संतुलन बना सकेंगी।
